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दो टूक

समाजशास्त्री कहते हैं कि सदियों पहले आसमान में चमकती बिजली ने इंसान को आस्तिक बनाया था। खगोल और भूगोल की न समझ आने वाली घटनाएं ईश्वर के बट्टे खाते डालकर संतोष कर लिया जाता था। जमरुदपुर गांव के आसपास रहने वालों का एक वर्ग मेट्रो पुल के हादसे को भी अंधविश्वास से जोड़ रहा है।

उसकी राय में किसी पीपल के पेड़ का कटना या किसी स्थानीय मंदिर का उजड़ना ही प्रोजेक्ट के लिए भारी पड़ा। ऐसी भोली मान्यताओं के नुकसान बड़े गहरे होते हैं। उनसे सिर्फ भ्रम ही नहीं फैलते, घोटालेबाजों और बेईमानों के पाप भी माफ हो जाते हैं। सोचिए, अगर जांच के दौरान ठेकेदार कंपनी के आरोपी इंजीनियर भी पीपल के पेड़ वाली दलील दे दें तो? अगर पीपल या मंदिर को ही रक्षा करनी है तो काहे को आईआईटी के एक्सपर्ट साइंसदानों की राय ली जा रही है?

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