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ब्लॉग वार्ता : रामजी की चिरई, रामजी का खेत

गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में किसान अपने खेते की एक दो क्यारियों में ज्वार बोने लगे हैं। किसानों ने जब से कपास और मूंगफली की खेती शुरू की, चिड़ियों का चारा कम हो गया। सो जोड़िया तालुके के किसानों ने रास्ता निकाला और कपास के खेत में ज्वार बाजरा बोने लगे ताकि चिडियों को उनका हिस्सा, जिसे किसान भगवान का भाग कहते हैं, मिल जाए। एक अखबार की इस रपट पर ब्लॉगर घुघूती बासुती ने अच्छी जानकारी दी है।

क्लिक कीजिए http:// ghughutibasuti. blogspot. com तो पता चलता है कि नवरंग नेचर क्लब गांव-गांव में रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत का संदेश दिया जा रहा है। बारिश होगी तो, 10,000 किसान अपने खेतों में ज्वार और बाजरे की एक पंक्ति लगाएंगे। घुघूती बासुती ने सौराष्ट्र प्रवास के अपने अनुभवों को भी साझ किया है। लिखती हैं कि जब चीकू पक गए थे। रोज चीकू तोड़ कर माली पहुंचा देता था। एक दिन जब नहीं लाया तो पूछने पर बताया कि पेड़ पर जो तीस चालीस चीकू हैं, उन्हें नहीं तोड़ूंगा। वो पक्षियों के लिए हैं। आपके लिए नहीं हैं। घुघूती जी शर्मिदा हो गईं कि सिर्फ अपना ही ख्याल रहता है, चिड़ियों का नहीं।

बहुत दिनों बाद चिड़ियों की चिंता में किसी को शर्मिदा होते पढ़ा है। सौराष्ट्र में लोगों ने अपने घरों के आगे सीमेंट के हौद बनाए हैं, ताकि गाय के लिए चारा डाल सकें। फल-सब्जी का छिलका कचरे में मिलकर बर्बाद होने से तो अच्छा है कि गाय को मिल जाए। दरअसल, जब से गाय को हिंदू राजनीति ने अपने तमाम झूठे प्रतीकों का हिस्सा बनाया है, गाय पर बात करना घोर राजनीतिक हो गया है। बचपन में मां पहली रोटी गाय को खिलाने के बाद ही हमें परोसती थी।

एक कारण यह भी है कि पिछले बीस साल में हिंदुस्तान में बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर हुए हैं। अपनी परंपराओं के निर्वाह की पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। बाग और पार्क में जाने का चलन कम हुआ तो चिड़ियों से रिश्ता और टूटा है। अक्सर किसी ग्रहों के डर से दिल्ली में अजमेरी गेट और मूलचंद फ्लाईओवर पर कबूतरों को चारा डालते देखा है। दूर-दूर से लोग आते हैं। चिड़ियों से रिश्ता निभाना आसान नहीं हैं। घुघूती जी लिखती हैं कि पशुओं से यही रिश्ता है कि गिर के वन में सिंहों की संख्या कम नहीं हुई। बढ़ी है। क्योंकि स्थानीय लोग शिकार नहीं करते। सिंह उनके मालदार पशुओं को खा जाते हैं। तब भी स्थानीय लोग सिंह का शिकार नहीं करते।

अहमदाबाद में धमाके हुए तो रिपोर्टिग के दौरान घायल कबूतरों पर मेरी नजर पड़ी थी। जब तक रिपोर्ट पूरी करता तब तक पक्षियों का उपचार करने वाला एक संगठन कबूतर को ले जा चुका था। वहां पहुंचा तो बगल में एक घायल सांप लेटा था और कोई मोर लेकर पहुंचा था। गजब का दृश्य था। लौटने लगा तो मुङो कांसे की थाली और कटोरे दे दिये गए। इसलिए ताकि पक्षियों के प्रति प्रेम बना रहे। इसी हफ्ते हमारे सहयोगी राजीव शर्मा बया का घोसला ले आए। इतनी मेहनत से और इतना सुंदर घोसला। राजीव ने कहा कि अब एक दिन दिल्ली में मेरा भी घर बन जाएगा। बया के घोंसले की खूबसूरती ने मंदी के इस मौसम में एक जुझरू पत्रकार का आत्मविश्वास बदल दिया।

http:// kudaratnama. blogspot. com क्लिक करते ही बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण कुदरती संसार के तमाम पहलुओं को लेकर बैठे मिलते हैं। चींटियों के बारे में बताते हैं कि दुनिया भर में चींटियों की चौदह हजार प्रजातियां हैं। जब मादा चींटी अपने जबड़ों को रगड़ कर पंखों को गिरा देती है तब रानी चींटी कहलाती है। रानी चींटी के अंडे से पहली बार जो चींटियां निकलती हैं, वो रानी चींटी की देखभाल करती हैं। इन्हें श्रमिक चींटियां कहते हैं। जो घोसले की रखवाली करती हैं, वो सैनिक चींटियां कहलाती हैं।

बाला का यह चींटी पुराण दिलचस्प है। बाला बता रहे हैं कि मेंढ़की मेंढ़क से आकार में बड़ी होती है। पहचानने का एक तरीका बताते हुए कहते हैं कि केवल नर मेंढ़क ही टर्र-टर्र करते हैं। बोलने की क्षमता तो मेंढ़की की भी होती है लेकिन वो चुप रहना पसंद करती है। नर मेंढ़क अपना अधिकार जताने के लिए टर्राते हैं। ठीक जैसे प्राणीजगत में मर्द करते हैं। म से मर्द और म से मेंढ़क। इतना सब बताने के बाद बाला कहते हैं कि मेंढ़की और मेंढ़क की शादी अंध विश्वास है। दरअसल विज्ञान बारिश का सही सही अनुमान नहीं लगा पाता इसलिए अंध-विश्वासों के सहारे लोग दिल बहलाते हैं। भूल जाते हैं कि ऐसा करते हुए इस उभयचर प्राणी के साथ कितना अत्याचार होता है।

ravish@ ndtv. com

लेखक का ब्लॉग है naisadak. blogspot. com

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