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हादसे के सबक

हमारे लिए एक-एक जान बेशकीमती है, इसलिए हकीकत होने के बावजूद इस तर्क पर जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जाना चाहिए कि दिल्ली की मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं में कुछ हादसे तो हो ही जाते हैं। क्योंकि अक्सर ऐसे तर्क हमें इंसान और खासकर गरीब मजदूरों की जान के प्रति असंवेदनशील बना देते हैं। इसका ध्यान रखना इसलिए भी जरूरी है कि पूरी मेट्रो परियोजना की अभी तक की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कुशलता या उसका विश्वस्तरीय होना नहीं है, बल्कि उसका संवेदनशील होना है।

दिल्ली मेट्रो की सवारी करते समय हमें भरोसा रहता है कि आमतौर पर इसमें दुर्घटना नहीं हो सकती। यह दिल्ली मेट्रो कार्पोरेशन की संवेदनशीलता ही है कि दिल्ली के लोगों को अपनी यात्रा लगभग दुर्घटना रहित रखने की एक मुकम्मल व्यवस्था दी है। रविवार की दुर्घटना के बाद सबसे बड़ी चुनौती इसी भरोसे को कायम रखने की है।

सारी बहस फिलहाल इस पर अटक गई है कि जो हुआ उसे दुर्घटना माना जाए या दुखद घटना। उसे किसी व्यवस्था की चूक माना जाए या किसी चूक की वजह से पैदा अव्यवस्था। हादसे के बाद मेट्रो कार्पोरेशन के चेयरमैन ई. श्रीधरन ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। लेकिन इस्तीफे या उसकी वापसी हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती। मुमकिन है कि जांच के लिए बनी समिति हादसे की वजह के साथ ही इस बात पर भी कुछ रोशनी डाल सके कि इसकी जिम्मेदारी किसी की है।

फिलहाल सबसे बड़ा काम ऐसा मुकम्मल इंतजाम करना है कि ऐसे हादसे फिर न हों। दुनिया भर में ऐसी परियोजनाओं के लिए जीरो एरर और जीरो टॉलरेंस की जो नीति अपनाई जाती है, उसे हमें भी लागू करना चाहिए। किसे जिम्मेदार माना जाए इसके भी कड़े नियम कायदे बनाना जरूरी है।

अभी तक तो यह लग रहा है कि ठेका किसी और को दिया गया, उसने आगे कई ठेके तमाम ठेकेदारों को दे दिए, आगे उन ठेकेदारों के भी सप्लायर वगैरह हैं, अब ये सब जिम्मेदारी एक दूसरे पर डाल रहे हैं। सख्त नियम कायदे और प्रभावी नियामक बनाकर ही ऐसे हादसों को रोका जा सकता है। मेट्रो का अभी तक का सारा काम ई. श्रीधरन के कुशल नेतृत्व के आधार पर ही खड़ा हुआ है, लेकिन श्रीधरन हर जगह मौजूद नहीं रह सकते, इसलिए समाधान एक ऐसी व्यवस्था बनाना ही है जिसके हर अंग में श्रीधरन जैसी कुशलता हो।

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