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दो टूक

अभी तक हम मानते रहे कि काम कैसे हो ये ई. श्रीधरन से सीखना होगा। दिल्ली को मेट्रो के रूप में जो व्यवस्था मिली, उसके बाद यह धारणा स्वाभाविक है। लेकिन अब सोचने के लिए और भी बहुत कुछ है। जिम्मेदारी का अहसास और पद से लगाव न रखना भी श्रीधरन से सीखना होगा।

कितने लोग हैं जो किसी हादसे के बाद इस्तीफा देते हैं? ऐसे नाम आप एक हाथ की उंगलियों पर ही गिन सकते हैं। यहां तो तमाम घपले घोटाले हो जाने के बाद लोगों को पुलिस-फौजदारी करके या धक्के तक देकर पद से हटाना पड़ता है। शीला दीक्षित का कहना है कि दिल्ली को श्रीधरन की जरूरत है, दरअसल पूरे देश को श्रीधरन जैसों की जरूरत है।

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