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स्थानीय क्षेत्र प्राधिकार का चुनाव

लोकसभा चुनाव में भले ही धन और बांह की हार हुई हो, स्थानीय निकाय कोटे के विधान परिषद के चुनाव में कुल मिलाकर धन का ही जोर रहा। हां, बांह की जरूरत यहां भी नहीं पड़ी। यह ऐसा चुनाव है जिसमें आयोग ने भी खर्च की अधिकतम सीमा तय नहीं की है। सो, अनुमान है कि 24 सीटों पर कम से कम सौ करोड़ रुपये का वारा-न्यारा हुआ। अगर उम्मीदवार सही हिसाब दें तो यह राशि बढ़ भी सकती है। वाम दलों के उम्मीदवार इसमें पीछे रहते हैं। इसलिए नहीं कि उनसे कोई रुपया नहीं मांगता है। वे जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। 


वाम दल पहले भी दलीय आधार पर ही निकाय चुनाव लड़ते थे। इसबार एनडीए, राजद, कांग्रेस, लोजपा और बसपा जसी पार्टियों ने भी दलीय उम्मीदवार खड़े किए। इसके पहले के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की धूम रही। ये निर्दलीय जीतकर सुविधा के अनुसार दलों से संबद्ध हो जते थे। कुछेक अपवाद को छोड़ दें तो सभी दलों ने उम्मीदवारों की माली हैसियत पर अधिक ध्यान दिया। जदयू की उम्मीदवारी के लिए आधे दजर्न सिटिंग विधान पार्षद ही लाइन में आ गए। एनडीए ने दूसरे दलों से आए कुछ उम्मीदवारों को छोड़कर संपन्न कार्यकर्ताओं को ही उम्मीदवार बनाया।


वोट के लिए नकदी, मोबाइल, साइकिल से लेकर दावतों का भी दौर चला। सीमांचल में बड़ी संख्या में मोबाइल बंटे तो मिथिलांचल, तिरहुत, सारण और मगध में नगद नारायण की ही चलती रही। नगद नारायण के रूप में पांच सौ से लेकर चार हजार रुपये तक की प्राप्ति हुई। फिर भी थोड़ा बदलाव आया। पहले इस चुनाव में वोटरों के प्रमाण-पत्र मतदान के दिन तक  के लिए गिरवी रखे जते थे। उम्मीदवार इस प्रमाण-पत्र के आधार पर अपने लोगों से वोट डलवा देते थे। अबकी यह व्यवस्था नहीं चली। वोटरों को प्रमाण-पत्र के अलावा पहचान पत्र लेकर मतदान केंद्र पर पहुंचना था। बड़े पैमाने पर नगद नारायण के कारोबार के बावजूद एनडीए उम्मीदवारों के पक्ष में रूझन रहा। एनडीए उम्मीदवारों को पंचायतों में आरक्षण का लाभ मिला। उधर कई सीटों पर राजद और कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े हो जने के कारण एनडीए विरोधी वोटों का बंटवारा हो गया।

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