अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

समावेशी विकास और हिचकती सरकार

पिछले कुछ समय से समावेशी विकास पर बहुत जोर दिया ज रहा है। हाल ही में संसद में पेश किए गए आम बजट में भी यही मुख्य केंद्रीय बिंदु था। दूसरी ओर इसमें आर्थिक सुधार या यूं कहें कि उदारीकरण का बहुत कम जिक्र है। और यह इसके बावजूद कि सालाना आर्थिक सर्वेक्षण में उदारीकरण के उपायों को अमल में लाने की जबरदस्त सिफारिश की गई है। इसका मतलब यह नहीं कि उदारीकरण के लिए सरकार की प्रतिबद्धता कमजोर पड़ गई है। यह जरूरी नहीं कि सरकार की सारी आर्थिक नीतियोंकी घोषणा बजट के ही माध्यम से हो। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उदारीकरण की नीतियों की घोषणा उपयुक्त समय परस्वतंत्र रूप से की जाएगी।

अर्थशास्त्रियों में आम सहमति है कि आर्थिक मंदी की स्थिति में उदारीकरण की नीतियों को स्थगित रखना ही श्रेयस्कर है। क्योंकि इस परिस्थिति में ये चाहे वो प्रभावहीन है या इनके प्रभाव से मंदी और भी गहरी हो ज सकती है। ऐसे अवसर में काउन्टर-साइक्लिकल उपायों की आवश्यकता है, प्रो-साइक्लिकल की नहीं। और उदारीकण की अधिकांश नीतियां प्रो-साइक्लिकल होती हैं। उदाहरण के लिए, आर्थिक मंदी मुक्त बाजार की विफलता मानी जाती है। इस विफलता से जूझने के लिए सरकार की अर्थव्यवस्था में सक्रिय भूमिका अपरिहार्य है। फिर इस संदर्भ में निजीकरण के उपायों की सिफारिश करने का क्या तुक है? उसी प्रकार जब विश्व बाजर एक पूंजी-कोष संकुचित हो रहा है, तो फिर विदेशी पूंजी निवेश प्रयासों को करने या निर्यात बढ़ाने के उपायों से क्या फायदा?
इस स्थिति में घरेलू बाजार के विस्तार से ही विकास की दर को बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए समावेशी विकास की नीतियांअत्यंत कारगर हो सकती हैं। इन नीतियों से भारत के 70 करोड़ ग्रामवासियों की क्रय शक्ति में वृद्धि हो सकती है। ग्रामीणबाजार के विस्तार से आम जनता के उपभोग की सामग्रियों और सेवाओं की मांग में वृद्धि होगी। इससे फिलहाल हृसोन्मुख उद्योगों में नए जीवन का संचार होगा।

समावेशी विकास की उपयोगिता केवल आर्थिक मंदी के संदर्भ में ही नहीं है। इसकी अपने आप में भी बड़ी अहमियत है। इसकेमाध्यम से सामाजिक न्याय और समानता प्रदान की जा सकती है, साथ ही संविधान के मानवाधिकार प्रावधानों को सुनिश्चित किया जा सकता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि आज से साठ साल पहले हमने अपने संविधान में नागरिकों को बुनियादी अधिकार प्रदान करने का जो वादा किया था, उसको हम अब तक निभा नहीं पाए हैं। इसके चलते राष्ट्र में बड़े पैमाने पर विक्षोभ है, जिसकीअभिव्यक्ति आए दिन उग्रपंथी हिंसा के रूप में हो रही है। इसके चलते देश के विघटन का खतरा अक्सर दिखाई देता है। समावेशी विकास इस भयावह स्थिति में सुधार लाने की क्षमता रखता है।

कुछ मुल्कों ने आर्थिक मंदी से निजात पाने के ऐसे पैकेज बनाए हैं, जिससे विकास की एक संतोषजनक गति को निरंतर कायमरखा जा सकता है। ऐसा करने की संभावना सबसे अधिक दो क्षेत्रों में है: मूल ढांचा यानी इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक विकास। मूल ढांचे के अभाव में पूंजीनिवेश प्राप्त नहीं हो सकता। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक विकास के बिना मानव संसाधन का विकास और संचय नहीं हो सकता, जो आर्थिक प्रगति की अनिवार्य शर्त्त है। चीन के करीब 600 बिलियन डॉलर के पैकेज का अधिकांश भाग मूल ढांचे को व्यापक और मजबूत बनाने में लगाया जाएगा। अमेरिका इस मौके का फायदा उठाकर स्वास्थ्य सेवाओं के इंश्योरेंस को सर्वव्यापी बनाने की चेष्टा कर रहा है। यह लक्ष्य 1.1 ट्रिलियन डॉलर के खर्च पर 10 साल में पूरा होगा। 2009-10 के बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर और समावेशी विकास के लिए अधिक खर्च का प्रावधान कर वित्तमंत्री ने निस्संदेह एक अच्छा कदम उठाया है। परंतु ये नितांत अपर्याप्त है। हकीकत तो यह है कि भारत का आर्थिक उद्धार का पैकेज संकीर्ण, अनुपयुक्त और दकियानूसी है। पहले तो पैकेज तुलनात्मक दृष्टि से छोटा है। पैकेज के माध्यम से अब तक उपलब्ध धनराशि भारत के सकल घरेलूउत्पाद का 3.5 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह अनुपात करीब नौ प्रतिशत है और ब्रिटेन में करीब 15 प्रतिशत। इस पैकेज की दूसरी बुनियादी कमजोरी है- बैंक और अन्य ऋण-संस्थानों के कर्ज पर अत्यधिक निर्भरता। मूल ढांचे के लिए उपलब्ध सारी रकम भारत इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी लि. या बैंकों के खाते में डाल दिए गए हैं।

सरकार स्वत: इस क्षेत्र में सक्रिय होना नहीं चाहती। और निजी कंपनियां इस क्षेत्र में पूंजीनिवेश करने में वर्षों से कतरा रही है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में निजी-सरकारी-साझेदारी (पीपीपी) में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसी कोई भी योजना नहीं बनी है, जिसके द्वारा इन क्षेत्रों की समस्याओं का हर तरह से समाधान हो सके। इन क्षेत्रों में किए गए वित्तीय प्रावधान भी नितांत अपर्याप्त हैं। शिक्षा के लिए जबसकल घरेलू उत्पाद के छह प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य है तो वास्तविक खर्च केवल तीन प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है, स्वास्थ्य के लिए तीन प्रतिशत लक्ष्य के बदले केवल एक प्रतिशत से थोड़ा अधिक। फिलहाल यह कहना अत्यंत कठिन है कि भारत में गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को हर नागरिक को उपलब्ध कराने के लिए और कितने दशकों का इंतजार करना होगा।

भारत सरकार ने आखिर आर्थिक उद्धार का इतना सतर्क, भीरुऔर अकल्पनाशील पैकेज क्यों बनाया? शायद इस धारणा के आधार पर भारत में आर्थिक मंदी का असर अधिक गहरा नहीं हुआ है। इस मंदी के बावजूद भी हमारा विकास दर पिछले साल 6.7 प्रतिशत रहा, और इस साल इसके सात प्रतिशत पहुंचने की संभावना है। शीघ्र ही हमारी आर्थिक व्यवस्था नौ प्रतिशत वृद्धि की गति प्राप्त कर लेगी। इस हालत में सतर्क रहना ही उचित है, खासकर मुद्रास्फीति की वृद्धि से। क्या सरकार और अनेक अर्थशास्त्रियों की यह धारणा सही है?
विश्वस्तर पर मंदी से इस साल छुटकारा पाने के लक्षण बहुत कमजोर हैं। सारे विश्वस्त अनुमानों के मुताबिक विश्व आर्थिक विकासदर में करीब 1.5 प्रतिशत की गिरावट होगी। इसलिए भारत के निर्यात में हो रहे ह्रास को रोकने की कोई उम्मीद नजर नहींआती। भारत के अनेक प्रमुख उद्योग अभी भी मंदी की चपेट में हैं। इन हालात में भारत की विकास दर में 5.4 प्रतिशत वृद्धि का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान ज्यादा सटीक लगता है, न कि सात प्रतिशत वृद्धि का भारत सरकार का अनुमान।

लेखक भारत के विदेश सचिव रह चुके हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:समावेशी विकास और हिचकती सरकार