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उत्तराखंड: सूखते प्रदेश की टूटती उम्मीदें

सितंबर 2008 के बाद उत्तराखंड के अधिकांश भाग में वर्षा नहीं के बराबर हुई। सर्दियों की वर्षा ने लगभग पूरी तरह धोखा दिया, वहां इस वर्ष जून के अंतिम सप्ताह तक भी मानसून का आगमन नहीं हुआ था। सूखा मौसम बहुत लंबा खिंच गया है और गर्मी का प्रकोप बहुत अधिक है। जून के महीने में लगभग दो सप्ताह तक यहां की यात्रा और गांववासियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के बाद पता चला कि यहां का जन-जीवन कितने कठिन दौर से गुजर रहा है।

बहुत उम्मीदों से बने इस नए राज्य में अनेक गांववासी, विशेषकर महिलाएं ठगा सा महसूस कर रहे हैं। हमें आश्चर्य हुआ, जब दोपहर की यात्रा के दौरान मैदानी इलाकों जैसी गर्म हवा झेलनी पड़ी। निश्चय ही यहां गर्मी उतनी नहीं थी जितनी दिल्ली में है, पर पहाड़ी क्षेत्रों की सामान्य स्थिति से बहुत अधिक थी। कुछ बुजुर्ग व्यक्तियों ने बताया कि इतनी गर्मी तो उन्होंने जीवन में कभी नहीं देखी है। लोगों की अनेक समस्याएं प्रतिकूल मौसम व गंभीर सूखे की मार से जुड़ी हैं, पर साथ ही यह भी सच है कि सरकारी नीतियां लोगों की अपेक्षा पर खरी नहीं उतर सकी हैं।

इस स्थिति को कुछ हद तक तो ग्लोबल वार्मिग के सन्दर्भ में समझा जा सकता है, पर साथ ही वनों के कटान, नदियों के अत्याधिक दोहन, विनाशकारी खनन की भी स्थिति को विकट करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। वनों में इतनी आग भी संभवत: कभी नहीं लगी जितनी कि इस बार लगी। हालांकि इसके कई कारणों पर बहस जारी है, पर जानकार लोगों के अनुसार एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि जो तत्व अवैध कटान, जड़ी-बूटियों की तस्करी व शिकार में लगे हैं कई बार वे ही वनों को आग लगाते हैं।

चिपको आंदोलन की मांगों के अनुरूप उत्तराखंड के एक बड़े पहाड़ी क्षेत्र में हरे पेड़ों के व्यापारिक कटान पर प्रतिबंध लगा था। पर इसके बाद भी अवैध कटान बड़े पैमाने पर जारी रहा। बहुत बड़े पैमाने के अवैध कटान को कई बार सामाजिक कार्यकर्ताओं नेपकड़ा भी। हाल के समय में विभिन्न परियोजनाओं के लिए स्थान बनाने के नाम पर पेड़ लाखों की संख्या में कट रहे हैं - जितनी जरूरत होती है, प्राय: उससे भी अधिक पेड़ कटते हैं।
आज यहां जरूरत पेड़ों को लगाने और नए जंगल बसाने की है लेकिन हो इसका एकदम उल्टा रहा है। जंगल आज भी बड़े पैमाने पर कट रहे हैं और जो जंगल कटने से बच जा रहे हैं वे आगजनी का शिकार हो रहे हैं। महिलाओं को नए राज्य से नशाबंदी की बहुत उम्मीद थी पर कड़वी सच्चाई यह है कि नए राज्य में शराब की खपत तेजी से बढ़ी है व पीने-पिलाने को सामाजिकप्रतिष्ठा दी जा रही है। इसी तरह महिलाओं ने विस्थापन बढ़ाने वाली नीतियों का विरोध जम कर किया है क्योंकि पलायन-प्रवास की ऊंची दर वाले इस पहाड़ी समाज में सबसे अधिक धरती से जुड़ी हुई भूमिका महिलाओं की ही है। इन ग्रामीण महिलाओं ने बहुत गहरी भावना से हमें बार-बार बताया कि वे विस्थापन या घर में ही बेघर करने वाली नीतियों का जबरदस्त विरोध करती हैं पर न तो सरकार व न ही स्थानीय पुरुष उनकी भावनाओं को पर्याप्त महत्व देते हैं।

राज्य सरकार के विभिन्न दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड में 343 से 540 तक पनबिजली परियोजनाएं लगाए जाने की योजना हैं। कार्यकर्ताओं के अनुसार यदि केवल अब तक प्रस्तावित पनबिजली योजनाओं से होने वाले विस्थापन को देखा जाए तो राज्य के लगभग एक चौथाई लोगों पर, यानी लगभग 5,000 गांवों में प्रतिकूल असर पड़ेगा। वे सीधे-सीधे विस्थापित न भी हुए तो उनकोविस्फोटों, धूल, बर्बाद खेत व चरागाह आदि के रूप में इतने प्रतिकूल असर झेलने पड़ेंगे कि वे अपने घर में ही बेघर होने जैसा महसूस करेंगे व इस तरह से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ेगी। यदि नदी परियोजनाओं में राष्ट्रीय पार्को, वन्य जीव संरक्षण व अन्यप्रोजेक्टों से होने वाले विस्थापन को जोड़ लिया तो विस्थापन की समस्या और विकट हो जाएगी। टिहरी बांध के विस्थापितों से बात करने पर पता चला कि आज तक उनकी समस्याओं का संतोषजनक समाधान नहीं हुआ। पुनर्वास का बहुत सा पैसा तो भ्रष्टाचारकी भेंट चढ़ गया। इस तरह काफी खर्च होने के बावजूद अब तक अनेक विस्थापित परिवार बहुत कठिनाईया झेल रहे हैं।
स्पष्ट है कि उत्तराखंड के लोग बहुत बुनियादी व गंभीर समस्याओं से त्रस्त है। नए मुख्यमंत्री के सामने प्रमुख चुनौती यह है कि इन समस्याओं का टिकाऊ समाधान करने वाली नीतियों का निर्माण हो व फिर उन्हें असरदार ढंग से लागू किया जाए।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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