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योग की व्याख्या

योग की दो प्रचलित व्याख्याए हैं- ‘योगष्चित्तवृति निरोध:’ और ‘सर्वचिन्ता-परित्यागो निश्चिंतो योग इति उच्यते’। पहली व्याख्या में मनुष्य के चित्त की बात कही गई है। यदि सारी वृतिया एक साथ रुक जाये तो मानसिक अभिप्रकाष ही अवरुद्घ हो जायेगा। यदि चित्तवृति निरोध को योग कहा जाए तो अचेतन अवस्था को भी तो योग कहना पड़ेगा।
 
दूसरा है- जहा कोई चिन्ता ही नहीं है, अर्थात् जब मन संपूर्ण चिन्ताशून्य अवस्था में है, यह योग की अवस्था नहीं हुई। इसलिए योग की सही और ग्रहण योग्य परिभाषा है- ‘संयोगो योगो इत्युक्तो जीवात्मा परमात्मन:’। विभु सत्ता के साथ अणु कीएकाग्रता हुआ योग, यही सटीक योग है। योग शब्द का व्युत्पत्तिगत अर्थ है, भूमा के साथ अणु का संमिश्रण, शिव और जीव के बीच, वृहत और क्षुद्र के बीच मिलन। साधक मात्र की एक ही इच्छा होती है और वह है सत्ता के साथ घुल मिलकर एक हो जाना। भक्त कहेगा- तुम मुझे जो कुछ छोटी सी वस्तु दे रहे हो, उससे मेरी क्षुधा, तृष्णा की निवृति नहीं होगी, इसलिए तुम्हारे निकट कोई छोटी चीज नहीं मागूंगा। तुम मुझे जो कुछ भी दोगे, वह तो छोटा-मोटा ही कुछ होगा, वह तुम्हारे जैसा वृहद् तो होगा नहीं। किन्तु मेरी तृष्णा है अनन्त। इसलिए यदि उस अनन्त क्षुधा, तृष्णा की निवृत्ति करनी ही है तो वह तभी होगी, जब तुम्हीं को पा जाऊंगा। कारण यह कि एकमात्र तुम्ही तो अनन्त हो। इसके उत्तर में परमपुरुष कहते हैं- वस्तु जगत् में या अति जागतिक क्षेत्र में अर्थात् भौतिक जगत में या मानस जगत में तुम क्या मुझसे कुछ भी नहीं चाहते हो? यहां तक कि कोई वरदान भी चाहते नहीं हो? इस क्षेत्र में एकमात्र उत्तर होना चाहिए-‘हे परमपुरुष! तुम मेरी बुद्घि को आनन्द के पथ पर परिचालित करो। मेरी बुद्घि जिससे सर्वदा शुभ के साथ, कल्याण के साथ, हित के साथ संयुक्त रहे। देखना-मेरी बुद्घि कभी विपथगामी न हो।’ इसके अलावा परमपुरुष से मांगने को और कुछ नहीं है।

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