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माकपा का द्वंद्व

केरल के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता वीएस अच्युतानंदन को पोलित ब्यूरो से हटाकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने यहस्पष्ट कर दिया है कि वह पिनरायी विजयन के साथ है। पार्टी के नेतृत्व का यह फैसला पार्टी के आम कार्यकर्ता को कितना रुचेगा, यह तो आने वाले दिनों में साफ होगा लेकिन केरल में अच्युतानंदन समर्थकों ने खुलकर इसका विरोध शुरू कर दिया है। अच्युतानंदन हालांकि माकपा के संस्थापक सदस्यों में से हैं, लेकिन उनकी ताकत पार्टी नेतृत्व में उनकी स्वीकार्यता से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और आम जनता में उनकी लोकप्रियता से है। 2006 के विधानसभा चुनावों में उन्हें टिकट न दिया जाना तय हुआ था, लेकिन इसी लोकप्रियता के दबाव में न सिर्फ उन्हें टिकट दिया गया बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाना पड़ा। इसलिए केन्द्रीय नेतृत्व को अपना फैसला कार्यकर्ताओं और जनता के गले उतारने में अच्छी खासी मेहनत करनी होगी। माकपा हमेशा ही भ्रष्टाचार के मामलों में अत्यंत शुद्धतावादी रुख अपनाती रही है, हालांकि अत्यंत भ्रष्ट राजनेताओं से मित्रता करने में उसे परहेज नहीं रहा। अबभ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे विजयन का बचाव करने से उसकी अपनी छवि को भी धक्का लगा है।

माकपा अगर यह मानती भी है कि विजयन निर्दोष हैं तो भी जांच पूरी होने तक उन्हें पार्टी पद से अलग किया जा सकता था,लेकिन पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को यह भी गवारा नहीं है। बाकी राजनैतिक पार्टियों में जो झगड़े होते हैं, वे अक्सर सबके सामने होते हैं, इससे अराजकता का दृश्य तो बनता है, लेकिन इस पारदर्शिता की वजह से पार्टियों की विश्वसनीयता भी बनी रहती हैऔर झगड़ों का निपटारा भी बेहतर ढंग से होता है। कम्युनिस्ट पार्टियों में गोपनीयता की वजह से यह संदेह तो होता ही है किमामला बाहर जितना दिख रहा है, अंदर उससे कहीं ज्यादा है। यह संदेह भी माकपा के लिए सारे देश में और खास कर केरल में काफी भारी पड़ेगा। यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रकाश करात के नेतृत्व वाला पोलित ब्यूरो वयोवृद्ध अड़ियल और ईमानदार अच्युतानंदन को नहीं संभाल सका। इस सारे मामले में विचारधारा का संघर्ष नहीं है, व्यक्तिगत स्वार्थ, राग-विराग और लचीलेपन की कमी है। अच्युतानंदन को हटाने के फैसले से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि वह और बढ़ेगी।

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