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फिर नक्सली हमला

छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव जिले में नक्सलवादियों ने एक ही दिन में तीन अलग-अलग हमले कर जिस तरह से 35 पुलिस वालों को मार डाला है, उससे वामपंथी अतिवादियों की बढ़ती आक्रामकता का तो पता चलता ही है, साथ में सुरक्षा बलों की रणनीतिक नाकामी भी दिखाई पड़ती है। इन हमलों में जिले के एसपी विनोद कुमार चौबे का मारा जाना इस बात को प्रमाणित करता है कि नक्सलियों ने पुलिस से बेहतर खुफिया जानकारी के आधार पर बारूदी सुरंगों का अचूक जाल बिछाया था और पुलिस उसमें बुरी तरह से फंस गई। वीके चौबे पिछले कई सालों से पूरी दक्षता के साथ नक्सल विरोधी अभियान चला रहे थे और इस दौरान उन्होंने रायपुर और भिलाई जैसे शहरों से नक्सलियों का आधार खत्म करने में कामयाबी हासिल की थी। लेकिन इन हमलों से उस पुलिस का मनोबल निश्चित तौर पर कमजोर होगा, जो अपनी महज 90 से 125 संख्या बल के साथ एक लाख की आबादी की रक्षा का हौसला रखती है। आखिर क्या वजह है कि कोबरा फोर्स के गठन और नक्सली खतरे से निपटने की संयुक्त योजना के बावजूद इस साल के मध्य तक नक्सली हमले में उतने जवान मारे जा चुके हैं, जितने पूरे पिछले साल में मारे गए थे। उधर मारे गए नागरिकों की संख्या भी 255 हो चुकी है। तेज होते हमलों का एक कारण नक्सलियों का घटता जनाधार बताया जा रहा है।यानी वे हताशा में ज्यादा हमले कर रहे हैं। दूसरी तरफ जिस तरह नक्सलियों का खुफिया नेटवर्क मजबूत हो रहा है और उड़ीसा के कोरापुट और मलकानगिरि, आंध्र प्रदेश के खम्मम और छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा को जोड़ कर एक मजबूत गलियारा बना रहे हैं,उससे तो अलग ही तस्वीर बनती है। यह गलियारा एक राज्य से खदेड़े जाने पर उन्हें दूसरे राज्य में शरण देगा और इसकी काटढूंढ़ने में सुरक्षा बलों का काफी लंबी तैयारी करनी होगी। दरअसल, नक्सलियों के पास क्रांति करने का कोई दर्शन भले न बचा हो, पर वे छापामार युद्ध की रणनीति विकसित करने में लगातार लगे रहते हैं। वे एक तरफ मुखबिरी करने वालों का खात्मा करने सेनहीं चूकते तो दूसरी तरफ माओवादी होने के शक में राज्य के दमन से पीड़ित जनता को अपने साथ जोड़ने में भी देरी नहीं करते। इसलिए अगर जनता रूपी जल में माओवादी मछली की तरह रहने का कौशल दिखाते हैं, तो उन्हें चुनौती देने वाले राजनीतिकदलों को पानी में उतरने का डर छोड़ना होगा। जाहिर है नक्सलियों से लड़ने का काम सिर्फ सुरक्षा बलों का ही नहीं राजनीतिक दलों का भी है। 

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