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खलबली मची और दोनों ओर

पिछले दिनों दिल्ली की मुखिया श्रीमती शीला दीक्षित ने जब दिल्ली नगर निगम को भंग करने की बात कही तो जितनी खलबली निगम में सत्ताधारी भाजपा में मची उतनी ही हलचल निगम के कांग्रेसी खेमे में नजर आई। सचमुच! ये बात वाकई चौंकाने वाली थी कि 1958 से पूर्ण रूप में स्थापित निगम में आखिर ऐसा क्या हो गया कि प्रदेश सुप्रीमो उसे अपने में मिलाने या भंग करने पर उतारू हो गईं। मामला साफ भी है श्रीमती दीक्षित ने अंतत: साफ कर दिया कि दिल्ली नगर निगम अपने कार्यो में बेहद सुस्त, भ्रष्ट व गैरजिम्मेदार साबित हो रहा है, जिसके चलते प्रदेश की जनता को खासी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। निगम की सुस्ती व गैरजिम्मेदारी का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहां एक पार्षद काम-काज के लिए चुना जाता था वहीं आज 4 पार्षद चुन कर आते हैं मगर काम की हालत जस की तस बनी हुई है। अब, ऐसे में मुख्यमंत्री चिंतित न हों तो क्या करें।

अनूप आकाश वर्मा,  नई दिल्ली

समाज विरोधी फैसले क्यों?

दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता के मामले में तो फैसला सुना दिया। लेकिन क्या सरकार या देश की अदालतों के पास इसका जवाब है कि अदालतों में इससे भी अधिक गंभीर और महत्वपूर्ण मामले वषों से क्यों लंबित हैं और उन पर जल्द फैसले क्यों नहीं लिए जा रहे हैं? दूसरी बात कि समलैंगिकों के पक्ष में हुए इस तरह के फैसले लेने से पहले कोर्ट ने समाज और संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में नहीं क्यों नहीं सोचा, यह काफी  अहम है। इससे जुड़े धारा 377 को खत्म करने से समाज में शोषण को बढ़ावा ही मिलेगा और कुछ नहीं।

मनु त्यागी, गाजियाबाद

गंगा की दयनीय दशा

मानव ने स्वार्थ की पूर्ति करने के लिए अपनी सकारात्मक सोच पर पर्दा डालते हुए गंगा के महत्व को पूर्णरूप से भुला दिया है। गौमुख से लेकर गंगासागर तक कोई भी स्थान ऐसा नहीं है जहां गंगा को मैला न किया जा रहा हो। छोटे-बड़े शहरों के गंदे नालेऔर कारखानों का गंदा, विषैला कचरा गंगा में लगातार डाला ज रहा है। गंदगी को अपने में समाहित कर अपनी यात्रा को किसी प्रकार जारी रख पाती, परन्तु विडम्बना यह है कि जगह-जगह उसके जल को बांधकर उसकी गति को प्राणहीन किया जा रहा है। गंगा अपनी पवित्रता और अस्तित्व को बचाने के लिए निरंतर छटपटा रही है।

सिद्धी लाल विद्यार्थी, देहरादून


कानूनन अर्धनारीश्वर

ऐसे कई देश है जहां समलैंगिकता को वध करार दिया गया है। अगर भारत भी इन मूलकों में शामिल होता है तो यह गलत बातनहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया है। जहां आपसी रजमंदी नहीं है वह धारा 377 प्रावधान अब भी लागू है। यह एक छोटी सी पहल है। समलैंगिक व्यक्तियों को अभी अन्य कई अधिकार भी चाहिए जैसे दत्तक ग्रहण का अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार आदि। धर्मगुरुओं को इस पर ऐतराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि प्रकृति ने हर व्यक्ति कोअर्धनारीश्वर रूप में बनाया है। एक व्यक्ति में ये दोनों गुण होते है, स्त्री तथा पुरुष गुण। समलैंगिकता का भी यही आधार है। एक पुरुष दूसरे पुरुष के प्रति उसके स्त्री गुण के कारण आर्कषित होता है और यह कोई अपराध नहीं।

तापसी सेमवाल, अजबपुर

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