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1909 और 2009 के राज-समाज के बीच विकास

जिस वक्त देशभर में समलैंगिकता निरोधक धारा 377 को लेकर संसद, न्यायपालिका और धर्मगुरुओं के बीच विचारोत्तेजक बहस छिड़ी हुई है, उसी वक्त खबर आई है, कि दुर्ग जिले के एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने अपनी बेटी का स्वेच्छा से किया प्रेम विवाह न सह पाने पर अपना गुस्सा बेटी के पुतले का अंतिम संस्कार करके उतारा! प्रेम विवाह या समलैंगिकता से लेकर नरेगा तक पर उठ रहे तमाम वितंडों के पीछे का रहस्य एक ही है : जमीनी स्तर पर उतर रहा हमारा लोकतंत्र गावों और छोटे शहरों के राज-समाज से टकरा रहा है। यह बात संप्रग सरकार के आगे अगले चार वर्षो तक कुछ ऐसी चुनौतिया पेश करेगी, जो अन्य विकसित देशों के आगे शायद कभी नहीं उभरी होंगी।

बात की शुरुआत करें नरेगा से! इसमें दो राय नहीं हो सकतीं, कि देश के गरीबों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा का तंत्र रचने में इस योजना का बहुत महत्व है, लेकिन बहुत करके आज भी हमारा तंत्र पारंपरिक ‘दोऊ हाथ उलीचिए यहि सज्जन को काम’ की मानसिकता से राज-समाज को नहीं उबारता। इसीलिए ताज बजट में और भी ज्यादा : 39,000 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन, नरेगा-2 के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। न्यूनतम दिहाड़ी 60 रु. प्रतिदिन से बढ़ा कर 100 रु. प्रतिदिन किए जाने से अब इस योजना के लाभार्थियों को देश के सूखे क्षेत्र के ग्रामीण मजदूरों से ज्यादा दिहाड़ी मिलने लगेगी। यह अच्छा है।

लेकिन अब उन क्षेत्रों के कृषि मजदूरों का गैर-कृषि क्षेत्र की ओर मुड़ना तय है। सवाल उठता है, कि वे वहां जाकर जो काम करेंगे वह क्या गरीबी स्थायी रूप से निवारेगा? नरेगा तो साल में 100 दिन ही रोजगार देगा, वह भी परिवार के एक जान को। इस दौरान पूर्व कृषि मजदूरों की इस विशाल तादाद को सही ट्रेनिंग देकर निर्माण या डेरी जैसे कृषि से इतर क्षेत्रों में शेष 265 दिन भी कमाने लायक क्षमता दिलाने वाला कोई ब्लूप्रिंट सरकार के पास है? या कि वे शेष वर्ष बहुत कम भुगतान पर भी जो धंधा हाथ में आया, उसे ही पकड़ने को बाध्य होते रहेंगे? क्यों न नरेगा-2 कृषि और गैरकृषि क्षेत्रों के बीच एक सेतु बन टिकाऊ रोजगार पैदा करे? वह सिर्फ दो हाथों को रोजगार मुहैया कराने की एक विराट् मुहिम बन कर ही रह जएगा, तब तो सिर्फ भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा।

नरेगा-2 के अन्तर्गत अगर गावों में स्थायी परिसंपत्तियों, सड़क-नहर-बाध और तापघर आदि का योजनाबद्ध ढंग से निर्माण किया जाएगा, तो वे कालांतर में पूरे इलाके में कृषि और कृषि आधारित उद्योगों की आमद बढ़ाएंगे और कृषि मजूरी की दरों को भी नरेगा-2 की मजूरी दरों से ऊपर नहीं, तो उनकी बराबरी में ले आएंगे! लेकिन सरकार और योजनाकारों का लगभग सारा ध्यान दिहाड़ी बढ़ाने और योजना का इलाका बड़ा करने पर ही दिखता है। बताया गया है बिहार में इस योजना की तहत 38 जिलों में से मात्र 18 पर 200 करोड़ ही खर्च किए ज सके हैं। और विपक्षी राजद का आरोप है कि इसमें से भी 18 करोड़ रुपए बिना काम कराए बाटें हैं।

झारखंड में भी स्थिति बेहतर नहीं। पर क्षेत्रीय नेतृत्व को ही दोष कैसे दें? किसी भी क्षेत्र में टिकाऊ मजदूरी की दरें उस क्षेत्र की कुल उत्पादकता से ही निकलती हैं। अगर उत्पादकता स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए जरूरी ढाचागत प्रबंध किए बिना सिर्फ मजदूरी की दरें बढ़ाने का कानूनी प्रावधान एक खास समयावधि के लिए कर दिया जए तो यह तो किसी सींकिया पहलवान को रुस्तमे हिन्द का चोग़ा भेंट कर उससे सालभर के भीतर उस चोगे में समाने लायक शरीर बनाने या फिर नंग-धड़ंग रहने की धमकी देने जसा हुआ।

बुंदेलखंड से उत्तराखंड तक आज हमारे कई पिछड़े राज्यों में शिक्षा-स्वास्थ्य- कल्याण, सड़क, बिजली और पानी के अभाव के कारण खेती अनुत्पादक हो गई है, और मजदूरी की दरें बहुत नीची। उन्हें बेहतर बनाने का कारगर स्थायी और इकलौता जरिया वहा गरीबों को कैश बाटना नहीं, बल्कि यह है कि वहा आधारभूत ढाचे की दुरुस्ती हो, यानी बिजली-पानी-सड़क का कारगर तंत्र कायम हो, साथ ही सर्वसुलभ शिक्षा के द्वारा वहा रहने वालों का मानसिक क्षितिज फैला कर उनकी गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार पाने की क्षमता भी मजबूत बनाई जाए।

ताज बजट में विकास की दृष्टि से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए भी आवंटित धन में 16 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई है। लेकिन इस लेखिका समेत जिन कई जानों ने देश में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आवंटित धनराशि नाकाफी होने पर लगातार ध्यान दिलाया है, वे इस बढ़ोतरी से बहुत उत्साहित नहीं। वजह यह, कि स्वास्थ्य कल्याण के सरकारी बजटों की राशि चाहे जितनी बढ़ जाए, अभी भी हमारे यहा बजटीय आवंटन रोगों के उपचार (यानी चिकित्सा-उपकरणों और जीवनरक्षक दवाओं की खरीद) की मद पर ही खर्च होता रहा है, रोगों के स्थायी निरोध पर नहीं। क्या इस बार यह ढर्रा बदलेगा? यह अभी तक अस्पष्ट है।

हर बीमार को चिकित्सा सुलभ हो इससे कहीं बड़ी जरूरत यह है कि आम जन का स्वास्थ्य मूलभूत रूप से इतना सुधरे ताकि बीमारिया उसे बार-बार न पकड़ें। और उसके लिए नए बजट को आजमूदा रोग निरोधी उपायों पर खर्च करने की अधिक जरूरत है। यानी हर गाव में स्वच्छ पेयजल और शौचालयों की सुलभता हो। मलेरिया और डेंगू के मच्छरों के सफाए के लिए दवाओं का नियमित छिड़काव किया जाए। शहरी हस्पतालों तक ले जाने वाली सड़कों की दशा सुधरे और साथ ही घरों के भीतर हर सदस्य (खासकर औरतों-बच्चों के लिए) बेहतर पोषाहार और शिक्षा (खासकर स्त्री शिक्षा) नियमित तौर से उपलब्ध कराने का इंतजाम हो ताकि खुद पारिवारिक ढाचे के भीतर जागरुकता बढ़े और लोग अपने परिवार को रोगों से बचाएं।

आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा इन तमाम मर्दों की बजाए स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए (प्राय: गैरजरूरी) उपकरण खरीदने और स्वास्थ्य कर्मियों की तनख्वाह पर ही खर्च किए जाने के फलस्वरूप ग्रामीण और पिछड़े शहरों में जमीनी दशा बड़ी खराब हो गई है। अधिकतर लोग बीमार होने पर खस्ताहाल स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बजए कर्ज लेकर भी उपचार के लिए शहरों के (कहीं अधिक भरोसेमंद) निजी चिकित्सकों के पास ही भागते हैं। इसलिए आपत्ति की घड़ी में पिछड़े इलाकों के मरीजों का जीना-मरना बड़ी हद तक परिवहन के साधनों तथा लोकल सड़कों की दशा पर भी अवलंबित होता है।

अलबत्ता हमारे परंपरावादी प्रशासकों को स्वास्थ्य बजट का रिश्ता ढांचागत सुविधाओं से यूं जोड़ना हास्यास्पद और गैरजरूरी प्रतीत होता है। सचाई तो यह है कि बिना साफ पीने का पानी, सैनिटेशन तथा सड़कों जैसी सुविधाओं को सुनिश्चित किए रोग-उपचार की मुहिम के लिए और ज्यादा धन आवंटित करना अंतत: छलनी में पानी उड़ेलना ही प्रमाणित होता है। माहभर के खर्चीले उपचार के बाद पीलिया का गरीब रोगी घर जाकर अगर फिर गंदा पेयजल पीने को बाध्य हो, कष्टकर जांचगी के बाद घर लौटे जच्चा-बच्चा को आगे के महीनों में साफ-सुथरा रिहायशी इलाका और पर्याप्त पोषाहार न मिले, तो स्वास्थ्य सूचकांक जस के तस बने रहेंगे। इसका प्रमाण राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रेक्षण (एन. एफ. एच. एस.) की सालाना रपटें हमें दे रही हैं।

इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा कि भारत की गरीबी-बीमारी-कजर्दारी के चक्र से स्थायी मुक्ति और टिकाऊ रोजगारों के सृजन की हर राह सीधे हमारे गावों तथा कृषिक्षेत्र से ही होकर जाती है। और बजट इस बात को रेखांकित करता है, तो ठीक करता है। लेकिन अब हमारे योजनाकारों, नेताओं के लिए विचारणीय मुद्दा ठोस व्यावहारिक तथ्यों के आधार पर आवंटित राशि के फलदायी निवहन का होना चाहिए। इसमें परंपराएं तोड़नी पड़ें, तो क्यों न तोड़ी जाएं?

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