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खतरों के खिलाड़ी

खतरा शब्द न होता तो राजनीति न होती। हिंदी तक न होती। यह सृष्टि तक नहीं होती। कहते हैं कि जब ब्रह्मा को अकेलेपन का खतरा रहा तो बोल पड़े ‘एक हूं अनेक हो जाऊं’। अकेला नहीं रहा गया और जब से दो हुआ द्वैत का पंगा हो गया और टंटा बढ़ गया। उस पुराण कथा को ही बांच लीजिए, जिसमें शिव जी अपने तीसरे नेत्र से कामदेव नामक पुराने हीरो को भस्म कर डालते हैं और जब उसकी बीवी रोती आती है तो कहते हैं कि तेरा पति हर प्राणी में कामदेव बन कर जीवित रहेगा! तब से भगवान शिव का आदेश मानकर काम हरेक में अपना काम करता रहता है। तो भी ऐसे कम नहीं हैं, जो निरीह कामदेव को अपने लिए खतरा मानकर हाथों में ईंटें लिए फिरते हैं कि कब मिले कब धर दें।

खतरे की महिमा अपने समाज में अपरंपार है। ब्रह्मा से ज्यादा खतरा सत्य है। खतरा न हो तो बच्चा दूध नहीं पीता। स्कूल नहीं जाता। होमवर्क तक नहीं करता। माताएं दूध तक नहीं पिलाती और लोग टहलने तक नहीं जाते। खतरे का बोर्ड लगा दो तो सब होने लगता है। डार्विन के विकासवाद में खतरावादी तत्व ही असल है। खतरे का जादू ऐसा है कि जो डार्विनवादी नहीं हैं जो सृष्टि को जैविक विकास नहीं ईश्वरीय मानते हैं, उनको डार्विन में ही खतरा नजर आता है।

पहले न्यूक्लियर पर सरकार को खतरा था तो सरकार का था जनता का नहीं था। फिर चुनाव आए तो सबको खतरा था, जनता को नहीं था और अब जब सरकार बन गई तो तो खतरे ने फिर मंच हथिया लिया है। मुलायम को खतरा लगा है, भाजपा को तो लगता ही रहता है। देखा-देखी सबको करेंट लगा है। नहीं लगा है तो सीपीएम का। धर्म समूहों को पक्का लग गया है। वे कंदराओं से निकल पड़े हैं।

धर्म में एक चुटकी भर खतरा डाल दो तो दंगा-फसाद और मंदिर-मस्जिद का आंदोलन हो उठता है। सरकार में खतरा डाल दो तो तानाशाही होने लगती है। सीमा पर खतरा डाल दो तो बंदूकें चलने लगती हैं। मुहल्ले में खतरे की अफवाह डाल दो तो दरवज्जे नहीं खुलते। सड़क पर डाल दो तो सडकें सूनी हो जाती हैं। किसी मंदिर-मस्जिद में खतरा डाल दो तो धार्मिक नेता मैदान में आ जाते है। किसी सब्जी में खतरा डाल दो तो बिकनी बंद हो जाती है।

किसी आदमी में एक प्वॉइंट खतरा डाल दो तो शैतान या रावण हो जाता है। किसी औरत के आस-पास खतरा लिख दो तो वह कुलटा, वेश्या, पतिता, डाकिनी, पिशाचिनी हो जाती है। संस्कृति में खतरा डाल दो तो वह परम पापिनी पश्चिमी संस्कृति हो जाती है और अगर आपने सेक्स में खतरा डाल दिया तो सब खतरों का खतरा जग जाता है। सब प्रकार के खतरों के खिलाडी खड़े हो जाते हैं।

खतराशास्त्र का एक उपनियम कहता है कि जब खतरा न हो तब उसे ढूंढ निकालना! न मिले तो एनकांउटरी पुलिस की तरह खतरे के होने के प्रमाण जुटा देना और हल्ला मचाना। घर के आस-पास बिजली का जो खंभा होता है, उसमें खतरा लिखा देखा है। सूने से काले अकेले खंभे के पतले पेट पर टीन के एक टुकड़े पर लाल रंग में  एक मानव खोपड़ी के आजू-बाजू क्रॉस करके रखी दो हड्डियों के ऊपर या नीचे लिखा ‘खतरा’ कहा करता है- ‘चार सौ चालीस वोल्टेज का खतरा है’।

कबूतर लोग हैं कि फिर भी तार पर बैठते हैं। झूले झूलते हैं और सार्वजनिक रूप से गाल गाते हुए ‘ख़तरनाक’ संबंध बनाते रहते हैं। सहमति से ‘गे’ संबंधों को जायज ठहराने वाली अदालत ने जो क्रांतिकारी फैसला किया है, उसमें खतरा ढूंढ लिया गया है। सारे कलयुगी धर्मधुरीन धर्मात्मा एकत्र होकर अपने-अपने धर्मध्वजा फहराने निकल पड़े हैं और अपनी प्रजा को बचाने निकल पड़े हैं। प्रजा को बताया जा रहा है कि ‘गे’ से खतरा है।

खतरों के इस मौसमी खेल के बारे में प्रजा बेहतर जानती है। प्रजा जानती है कि पुराने जमाने में राजाओं में ‘हरम’ रखने की और  ‘लौंडे’ पालने तक की प्रथाएं रही हैं। प्रजा जानती है गांवों में नगरों में चोरी-चोरी, चुपके-चुपके सहमति से या जबरिया कईं चीजें आज भी चलती रहती है। केस बनते रहते हैं। प्रजा भी किसी तरह के जबरजोर को ठीक नहीं मानती। प्रजा जानती है कि संस्कृति विकृति से बनती है संस्कार और विकार साथ-साथ द्वंद्वमय होते रहते हैं। जीवन जीने की कलाओं में विविधता है। वह मानवेतर जीवों में है। मनुष्यों में है। विविधता में खतरा नहीं होता।

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