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बिमल दा की कल्पना नापी नहीं जा सकती..

बिमल दा की कल्पना नापी नहीं जा सकती..

श्वेत-श्याम फिल्मों के युग में देवदास, मधुमती, यहूदी, बंदिनी और सुजाता जैसी कभी न भूली जाने वाली भावना प्रधान फिल्मों का निर्माण करने वाले महान फिल्मकार बिमल रॉय पीढियों के परे आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलो दिमाग पर छाए रहते हैं। भारतीय सिनेमा को उन्होंने बेहतरीन फिल्में ही नहीं दीं, बल्कि कई दिग्गज कलाकार भी दिये।

धर्मेन्द्र
मैं भाग्यशाली हूं कि एक कलाकार के रूप में जब मैं उभर रहा था, तब बिमल दा की अंतिम फिल्म बंदिनी में मुझे एक महत्त्वपूर्ण कैमियो रोल मिला था। फिल्म में सदाबहार अशोक कुमार और हर तरह का रोल करने में माहिर नूतन थीं। बिमल दा हमेशा ध्यान देते थे कि इन दो बड़े कलाकारों के बीच मैं सैंडविच न बन जाऊं। नबेंदु घोष की स्क्रिप्ट बहुत अच्छी थी। किसी भी कलाकार के प्रति पक्षपात की भावना नहीं थी। ‘बंदिनी’ के डॉक्टर के रोल के लिए मेरी बॉडी लैंग्वेजबहुत नियंत्रित रहनी आवश्यक थी। जेल के एक सीन में मैंने नूतन का मेडिकल परीक्षण किया और मेडिकल किट और छाते के साथ बाहर निकला, तब बिमल दा ने पीछे से मेरा शॉट लिया। उससे पहले नूतन का एक क्लोज-अप शॉट था। वह दृश्य किसी कविता की तरह भावात्मक था। बिमल दा ने मुझे प्यार से धर्मेदू’कहा। मुझे बिमल दा की बहुत याद आती है। अन्य निर्माता-निर्देशकों की तरह उन्होंने मेरे शरीर सौष्ठव का फायदा नहीं उठाया, बल्कि मेरी प्रतिभा को तराशा। बाद में तो मुझे ही मैन, एक्शन हीरो आदि के  रूप में पेश किया जाने लगा।

साधना
जब बिमल दा ने मुझे 1962 में परख के लिए बसंत चौधरी के अपोजिट साइन किया, तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। वह एक पूर्ण निर्देशक थे और अपने कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित एवं बहुत कल्पनाशील और संवेदनशील थे। बिमल दा ने मुजे प्रेरित किया कि सुजाता में जितना प्रभावशाली अभिनय नूतन ने किया था, उतना ही प्रभावशाली अभिनय मैं परख में करूं। इस फिल्म में बिमल दा ने मुझे और बसंत चौधरी को बराबर का रोल दिया था। उन्होंने जयंत और राशिद खान से भी अच्छा अभिनय करवाया। वह एक्टर्स और टेक्नीशियंस को अच्छी तरह समझा देते थे कि वह उनसे क्या चाहते हैं। मैंने बिमल दा की फिल्म प्रेमपत्र में भी काम किया है, शशि कपूर के अपोजिट। बिमल दा मेरे दिलो दिमाग में हमेशा रहेंगे।

दिलीप कुमार
50 के दशक में मैंने बिमल दा की तीन फिल्मों- देवदास, यहूदी और मधुमती में काम किया था। तीनों फिल्में एक-दूसरे से अलग थीं। बिमल दा हर दृष्टि से एक एक्टर के डायरेक्टर थे। वह अपनी स्क्रिप्ट के हिसाब से कलाकार से अपनी जरूरत के अनुसार अभिनय करवा लेते थे। देवदास और यहूदी के लिए उन्होंने स्क्रिप्ट राइटर नबेंदु घोष से एक अजीब-सा संबंध बना लिया था। नबेंदु ने बिमल दा की हर  फिल्म की पटकथा के साथ पूरा न्याय किया था। जब बिमल दा ने देवदास के रोल के लिए मुझसे कहा, तब मुझे रोमांच का अनुभव हुआ। प्रमाथेश बरुआ और के.एल. सहगल की देवदास मैंने नहीं देखी थी। मैं नहीं चाहता था कि उनके अभिनय का प्रभाव मेरे अभिनय पर पड़े। कलाकारों के चुनाव में उनकी प्रतिभा गजब की थी। देवदास में सुचित्रा सेन, वैजयंतीमाला और मोती लाल के चयन के बारे में मैं कहूंगा कि आज भी इन कलाकारों की जगह किसी दूसरे कलाकार के विषय में नहीं सोचा जा सकता।

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