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अभी भी दूर है अस्पताल

दिल्ली सरकार ने प्रत्येक 10-15 किलोमीटर की दूरी पर सरकारी अस्पताल बनाने की योजना का काम चला रखा था। दिल्ली से लगे बादली विधानसभा क्षेत्र तथा लिबासपुर निगम पार्षद के क्षेत्र में आने वाले सिरसपुर गांव में लम्बे समय से 150 बिस्तर वाले अस्पताल का निर्माण करवाने के लिए उसकी आधारशिला भी रखी गई। 96 बीघे जमीन को समतल करने के पश्चात उसकी आधारशिला रखने का कार्य भी स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम से रखा। लम्बे समय तक इस जमीन पर विवाद चलता रहा और अस्पताल बनकर तैयार नहीं हुआ। जबकि इसके साथ रोहिणी, जहांगीरपुरी, नरेला में अस्पताल बनकर तैयार भी हो गए।

बीना रानी टांक, डीयू, दिल्ली

प्रणब को आदाब

बजट पेश करने वाले दिन वित्त मंत्री की दशा उस किसान जसी होती है, जिसकी एक बेटी माली के घर ब्याही थी और दूसरी कुम्हार के। जब वह उनसे मिलने गया तो पहली ने कहा, ‘बापू दुआ करो बारिश हो।’ दूसरी ने कहा,‘बापू दुआ करो बारिश न हो।’ वसे तो हमारे देश में खास आदमी-आम आदमी के बीच खाई पाटने में वर्षो लग जएंगे, मगर वित्त मंत्री ने उस ओर एक अच्छा कदम उठाया है ताकि ‘इंडिया के भारतीय’ भी अपने हिस्से का अनाज/ कपड़ा खरीद सकें। शायद एक छत भी उन्हें नसीब हो जाए। मंजिल अभी दूर सही मगर चलना तो शुरू हुआ। रही कॉपरेरेट जगत की बात, तो वह तो हमेशा मुनाफा वसूली वाला बजट चाहता है और कर्मचारी वर्ग छठे वेतन आयोग के गफ्फे के बाद भी खुश नहीं, कोई करे भी तो क्या?

डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

बिहार से नजर नहीं फेरें

रेल बजट और आम बजट में बिहार के लिए कुछ भी नहीं। ममता बनर्जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय रेल को बुलंदियों तक पहुंचाने के लिए बिहार के कुछ प्रमुख नेता ही जिम्मेदार हैं। मैं वित्तमंत्री से भी गुजरिश करूंगा कि एक बार बिहार का अवश्य दौरा करें और वह भी बाढ़ के समय में, और जनें कि कितने परिवारों को रोटी मिलती है, कितनों को कपड़ा मिलता है और कितनों को नहीं।

महफूज आलम, सदर बाजार, दिल्ली

समाज से अलग नहीं

वक्त तेजी से बदल रहा है। दुनिया भी बदल रही है। हो रहे परिवर्तन कुछ अच्छे हैं और कुछ बुरे भी। बुरे परिवर्तन कितने बुरे व समाज के लिए कितने घातक हैं, यह तो कुछ अनुभव होने के बाद ही पता चलता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक लम्बे अर्से से उठ रही मांग समलैंगिकता को मंजूरी देने की मान ली है और उक्त याचिका के हक में फैसला भी कर दिया है। वसे बात ठीक भी है। दो वयस्क नर या नारी आपसी सहमति से यदि साथ रहना चाहते हैं तो रहें। यदि समाज उन्हें नहीं स्वीकारता या दुत्कारता है या उनका बहिष्कार करता है तो यह उनको ङोलना है और उन्हें ही निर्णय करना है कि वे क्या करें, क्या न करें? व्यक्ति समाज से बड़ा नहीं और अंतत: उसे वही करना पड़ता है, जो समाज चाहता है।

इन्द्र सिंह धिगान,  दिल्ली

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