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समलैंगिक मुद्दे पर धर्मगुरू एक, कोर्ट से सामना

समलैंगिक मुद्दे पर धर्मगुरू एक, कोर्ट से सामना

कोर्ट और धर्मगुरु आमने-सामने

वयस्कों के बीच आपसी रजामंदी से बनने वाले समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के साथ ही यह मुद्दा कानून व समाज दोनों कसौटियों पर कसा जाने लगा है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया है जबकि इसका पुरजोर विरोध कर रहे धर्मगुरुओं ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। साथ ही, वे इस मुद्दे पर देश भर में जगरूकता जगाने जा रहे हैं। इधर सरकार को अदालती फैसले की बारीकियों का अध्ययन करने वाले तीन सदस्यीय मंत्रिसमूह की रिपोर्ट का इंतजार है।

समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का रुख भी नरम

समलैंगिकों के खिलाफ अभियान छेड़ने वालों को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से गलत नहीं मानती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि डेढ़ सौ साल पुराने इस कानून में अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है जिसमें किसी व्यक्ति को समलैंगिक यौन संबंध बनाने के लिए दंडित किया गया हो। हां, बच्चों के साथ कुकर्म करने वालों को सजा जरूर दी गई है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन और पी. सथाशिवम की खंडपीठ ने गुरुवार को ये टिप्पणियां ज्योतिषी सुरेश कुमार कौशल की याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं। पीठ ने याचिकाकर्ता का यह आग्रह ठुकरा दिया कि समलैंगिकों को शादी करने से रोका जाए। याचिकाकर्ता के वकील प्रवीण अग्रवाल ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसला के बाद समलैंगिकों ने आपस में ब्याह रचाना शुरू कर दिया है। लेकिन जस्टिस बालाकृष्णन ने मुस्कुराते हुए उनका आग्रह टाल दिया और कहा कि वह विवाह की परिभाषा को बदलने नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि दूसरे पक्षों को सुने बगैर इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने केंद्र व दिल्ली सरकार समेत गैर सरकारी संगठन ‘नाज फाउंडेशन’ से याचिका पर जवाब मांगा है। नाज फाउंडेशन की याचिका पर ही दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को हल्का किया है। सुनवाई के दौरान समलिंगी ब्रिगेड कोर्ट परिसर के बाहर जमा थी। कोर्ट के सकारात्मक रुख की खबर आने पर उन्होंने संतोष की सांस ली। मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।

एकजुट हुए संत, मौलाना व फादर

हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मगुरु समलिंगियों को मान्यता देने के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले का विरोध करे और समलिंगी संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को बहाल करवाए।

गुरुवार को प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में मुस्लिम धर्म गुरु और जमाते इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद जलालुदीन उमरी ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह भारतीय संस्कृति और मान्यताओं के विपरीत है।

सम्मेलन में जैन मुनि आचार्य लोकेश, ईसाई धर्मगुरु फादर डोमनिक इमेन्युअल तथा दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के युवा विंग के अध्यक्ष दलजीत सिंह ने कहा कि वे समलिंगी संबंधों को अपराध नहीं मानते। यह एक मानसिक स्थिति है जिसे परामर्श और काउंसिलिंग के जरिये ठीक किया जा सकता है। लेकिन इसे कानूनी मान्यता देना गलत है। यह प्रकृति के विरुद्ध है। धर्मगुरुओं का कहना था कि कल को लोग जनवरों से भी संबंध बनाने की मांग करने लगेंगे तो क्या सरकार उसे अनुमति देगी। उन्होंने कहा कि समलिंगी विवाहों से परिवार की परंपरा ही समाप्त हो जाएगी।

लॉ बोर्ड सदस्य एसक्यूआर इलयास ने कहा कि धर्मगुरु देशभर में लोगों को जागरूक करने का मुहिम चलाएंगे और बताएंगे कि समलिंगी संबंध किस तरह भारतीय मूल्यों के विपरीत हैं।

मंत्रिसमूह से एकराय की उम्मीद

समलैंगिकता पर हाईकोर्ट के चर्चित फैसले के बाद प्रधानमंत्री के निर्देश पर फैसले के सभी पहुलुओं की जांच के लिए तीन सदस्यों का मंत्रिसमूह बनाया गया है। इस समूह से कहा गया है कि वे इस संवेदनशील मसले पर सरकार की ओर से समन्वित राय बनाएं ताकि सुप्रीम कोर्ट में एक सर्वसम्मत विचार पेश किया जा सके। इस समूह में गृहमंत्री पी. चिदंबरम, विधि मंत्री वीरप्पा मोइली और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजद शामिल हैं। गौरतलब है कि पिछली सरकार के गृहमंत्री शिवराज पाटिल के कार्यकाल में इस मुद्दे पर मंत्रियों की एकराय नहीं बन पाई थी।

समलिंगी विवाह वैध नहीं : भारतीय कानूनों के तहत विवाह वयस्क महिला और पुरुष के बीच ही संभव है। 2 जुलाई के हाईकोर्ट के फैसले से दो वयस्क महिला या पुरुष (18 वर्ष से ज्यादा) समलिंगियों को आपसी रजामंदी से यौन संबंध बनाने की ही छूट मिली है। समलिंगी यदि ब्याह कर भी लें तो उसे वैध विवाह नहीं माना जा सकता और न ही पंजीकृत किया जा सकता है।

फैसले के बाद धड़ाधड़ ‘विवाह’ : समलैंगिक संबंधों पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद से अब तक ऐसे सात समलैंगिक जोड़े ब्याह कर चुके हैं। कुछ ने गुरुद्वारे में तो कुछ ने नासिक के प्रसिद्ध शिरडी मंदिर में ‘विवाह’ कर लिया है। इस फैसले से पूर्व धारा 377 के तहत समलिंगी संबंधों को अप्राकृतिक माना जाता था, जिसके लिए उम्रकैद तक का प्रावधान था।

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