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परशुराम ले गए थे पहली कांवड़

हरिद्वार कांवड़ यात्रा को लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। कांवडम् यात्रा के बारे में कोई पौराणिक आख्यान उपलब्ध न होने से विद्वानों में इस परंपरा की शुरूआत को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चलती रही हैं। महर्षि पाराशर ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के ज्योतिषाचार्य विपिन कुमार पाराशर ने दावा किया है कि पुरामहादेव मंदिर में शिवलिंग की स्थापना परशुराम ने की थी और उन्हीं ने ही पहली कावंडम् ले जाकर जलाभिषेक किया था। इसके बाद से ही यह परंपरा शुरू हुई है।ज्योतिषाचार्य विपिन कुमार पाराशर ने वाल्मीकि रामायण, महाभारत के वन पर्व, पशुराम महागाथा तथा वर्ष 1408 से 1418 तक के फसली रिकार्ड का हवाला देते हुए बताया कि बागपत जनपद में स्थापित पुरामहादेव मंदिर की स्थापना भगवान परशुराम ने हरिद्वार की हरकी पैडम्ी से निकाले गये शिवलिंग से की थी। भृगु स्मृति में उनके कांवडम् ले जाकर जलाभिषेक करने का वर्णन भी आता है। बताया कि भगवान परशुराम शिव के अनन्य उपासक थे।

उन्होंने आर्यावर्त के चारों ओर बारह ज्योतिर्लिगों की स्थापना की थी। इसके बाद परशुराम उडम्ीसा स्थित महेन्द्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये।इस बीच लंका के राजा रावण ने मयराष्ट्र के अधिपति मयासुर की पुत्री मंदोदरी से विवाह कर लिया। इससे मयासुर के पुत्र मायावी और दुंदुभी अत्यन्त उदंड हो गये। उन्होंने बहनोई रावण के बल में चूर होकर परशुराम को चुनौती दे डाली।

परशुराम ने दोनों को युद्ध में हराया। और ब्रह्मकुण्ड स्थित गंगा से शिवलिंग लाने को कहा। दुंदुभी और मायावी हरिद्वार तो आए पर गंगा से शिवलिंग नहीं निकल पाए। परशुराम ने स्वयं हरकी पैडम्ी पर बैठकर मां गंगा की तपस्या की। गंगा ने प्रसन्न होकर परशुराम को शिवलिंग निकालकर दिया।शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम ने बांस की कांवड बनाकर एक भाग में शिवलिंग तथा दूसरे भाग में गंगाजल को भरकर पुरा तक यात्रा प्रारम्भ की वहां पहुंचकर उन्होंने श्रावण कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिवलिंग की स्थापना कर दी तभी से श्रावण की कांवड यात्रा प्रारंभ हुई है।नोट : इस खबर का उपयोग मेरठ संस्करण में भी हो सकता है। कृपया उन्हें भी भेज दें।

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