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किसके हक में खड़ी हैं ख़बरें

महिलाओं से बलात्कार की खबरें आजकल चर्चा में हैं। चाहे कश्मीर के शोपियां में दो महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हो, जिसके कारण घाटी में हिंसा हुई या मुंबई में एक फिल्म अभिनेता द्वारा घरेलू नौकरानी से किया गया बलात्कार। चर्चा मुंबई बलात्कार के मामले से शुरू करें। आरंभ में तो यह घटना रोजमर्रा की अपराध खबर जैसी थी। पुलिस ने अभिनेता को घरेलू नौकरानी से बलात्कार के आरोप में हिरासत में लिया था, लेकिन अगले ही दिन मामला अखबारों के पहले पेज की खबर बन गया। आरोपी अभिनेता शाइनी आहूज एक जाना-पहचाना नाम है और नौकरानी ने घटना के कुछ ही घंटे बाद शाइनी आहूज के खिलाफ थाने जकर शिकायत दर्ज कराई थी।

वैसे अभी इस मामले की जांच चल रही है, लेकिन पुलिस से जनाकारी लेकर अति उत्साही मीडिया नियमित रूप से इस बारे में जानकारी दे रहा है। अभिनेता द्वारा बलात्कार के खंडन और मित्रों व संबंधियों द्वारा अभिनेता के अच्छे चाल-चलन से जुड़ी खबरें भी टेलीविजन और अखबारों द्वारा पूरी निष्ठा से दिखाई तथा छापी ज रही हैं।

अदालत में मामला दाखिल होने से पहले ही, समाज और मीडिया में इस घटना पर टीका-टिप्पणी शुरू हो गई है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने पीड़ित महिला से मिलने के बाद घोषणा कर दी कि अरोपी दोषी है और उसे सजा मिलनी चाहिए। दूसरी तरफ अभिनेता की पत्नी ने प्रमुख टीवी चैनलों पर सफाई दी कि उसका पति बेकसूर है और उसे फंसाया जा रहा है। जब अभिनेता की पत्नी से पूछा गया कि वह कैसे कह सकती है कि उनके पति को फंसाया जा रहा है, तो उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। वह बस यही कहती रही कि उन्हें विश्वास है कि उनका पति ऐसा घटिया काम नहीं कर सकता। अभिनेता के मित्रों और समर्थकों ने भी उसे भला आदमी व एक अच्छा पिता बताया। उनकी नजर में भी वह बेकसूर है।

इस मामले में पीड़ित महिला अपने बचाव में कुछ नहीं कह पाई है। शाइनी आहूज की पत्नी द्वारा पति को फंसाने के आरोप का भी उसने प्रतिवाद नहीं किया। आमतौर पर बलात्कार पीड़ित सार्वजनिक रूप से बयानबाजी नहीं करती। कानून के अनुसार मीडिया को भी यह सुनिश्चित करना होता है कि पीड़ित का नाम और चित्र न दिया जाए और न ही कोई ऐसी जनाकारी दी जाए, जिससे उसकी पहचान हो सके। इसके बावजूद एक टेलीविजन चैनल और एक समाचार-पत्र ने महिला का चित्र, जिसमें उसका चेहरा ढका हुआ था, छापा व दिखाया। ऐसा करके उन्हें क्या मिला? बहुत से समाचार-पत्रों ने महिला के बारे में यह जनकारी छापी कि वह किस गांव में रहती है, उसके पिता क्या करते हैं तथा और कई ऐसी बातें बताईं, जिनसे महिला को पहचाना जा सकता है। गनीमत है कि मीडिया ने पीड़ित महिला पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अभिनेता से जुड़ी खबरों में ही ज्यादा दिलचस्पी दिखाई गई।

मुंबई में एक विदेशी छात्रा के साथ छह लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटना में एक बार फिर मीडिया ने पीड़ित की पहचान छुपाने की शर्त का उल्लंघन किया। वैसे किसी ने भी पीड़ित का नाम प्रकाशित नहीं किया, लेकिन नाम के अलावा वह किस संस्थान में पढ़ती है, कौन सा कोर्स कर रही है, उसके कोर्स के कोर्डिनेटर का नाम, किस हॉस्टल में रहती है, कमरे का नंबर और उसकी रूममेट का नाम आदि देकर उसकी पहचानजगजहिर कर दी। जहां वह पढ़ती थी, उस कैंपस के ज्यादातर छात्र पहले इस घटना के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन विवरण छपने के बाद सबके लिए अनुमान लगाना आसान हो गया।

शाइनी आहूज के संबंधी उसे अच्छे चरित्र का प्रमाण-पत्र दे रहे हैं, जबकि विदेशी छात्रा के मामले में बचाव पक्ष के वकील ने यह सवाल उठाए कि वह छह लड़कों के साथ बाहर क्यों गई और उसने शराब क्यों पी थी? मीडिया में ये खबरें प्रमुखता के साथ छापी गईं, जबकि पीड़ित पक्षसार्वजनिक तौर पर अपनी सफाई देने की हालत में नहीं था।
ये खबरें मीडिया में उछलने का नतीजा यह हुआ कि बलात्कार का मुद्दा गौण पड़ गया। किसी ने इसकी परवाह नहीं की कि जब एक महिला से बलात्कार होता है तो उस पर क्या बीतती है? अमीर-गरीब, काली-गोरी, युवा या वृद्ध हर तरह की महिलाओं से बलात्कार होता है। कुछ लोग आरोप लगाते हैं महिलाओं का पहनावा पुरुषों को उकसाता है? क्या कोई महिला हिंसात्मक यौन उत्पीड़न का शिकार होनी चाहेगी? अगर कमजोर होने के कारण वह बलात्कार रोक नहीं पाती और प्रमाण के तौर पर अपने शरीर पर मौजूद चोटों के निशान दिखाती है तो क्या इसे उसकी सहमति समझी जाना चाहिए? शाइनी आहूज का बचाव कर रहे लोगों का तर्क है कि जो हुआ वह महिला की सहमति से हुआ, इसलिए यह बलात्कार नहीं था। युद्ध और शांति दोनों ही स्थितियों में महिलाओं को घर और बाहर सभी जगह बलात्कार या हिंसक यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। युद्ध और दुश्मनी में तो बलात्कार विरोधी पक्ष से बदला लेने का हथियार बन गया है। युद्ध के दौरान महिलाओं के साथ क्या होता है, इसका एक वीभत्स उदाहरण रवांडा में महिलाओं के साथ हुई बलात्कार की घटनाएं हैं। डेट रेप (पानी या पेय पदार्थ में दवा मिलाकर बलात्कार करना), परिवार में संबंधियों द्वारा, नाबालिग से ( इस देश में तो यह मिथ्या धारणा है कि अगर किसी पुरुष को एड्स है तो नाबालिग लड़की से संबंध बनाने पर वह ठीक हो जाएगा), हिरासत में, सांप्रदायिक व जतीय दंगों के दौरान, सुरक्षा बलों और सशस्त्र विद्रोहियों द्वारा बलात्कार करने की फेहरिस्त लंबी है। बलात्कार कभी-कभी होने वाली घटना नहीं है। बलात्कार के जितने मामले दर्ज होते हैं, उससे कई गुना ज्यादा बलात्कार की घटनाएं होती हैं। भारत में बलात्कार संबंधी कानून स्पष्ट है। दोषी के खिलाफ बलात्कार पीड़ित की गवाही महत्वपूर्ण है। यहां तक कि इन मामलों में देर से शिकायत करने, अपर्याप्त चिकित्सा प्रमाण-पत्र होने जैसी परिस्थिति में भी अदालत पीड़िता के बयान को महत्व देती है। दोषी को स्वयं को निर्दोष साबित करना होता है।

कानून इतना कड़ा होने के बावजूद बलात्कार के मामलों में सजा बहुत कम होती है। आमतौर पर पीड़ित पक्ष बचाव पक्ष के दांव-पेच झेल नहीं पाता। अगर पीड़ित गरीब हो और दोषी पैसे वाला तो सजा मिलना और भी दुश्वार होता है। दोषियों को सजा इसलिए भी कम होती है, क्योंकिपीड़ित महिलाएं शिकायत करने में झिझकती हैं। वे समाज में बदनामी से डरती हैं। उनका परिवार भी अदालत में मुकदमा लड़ने की बजाय मामले को दबाना पसंद करता है। अब मीडिया जिस तरह से बलात्कार के मामलों को, खासकर अगर वे मध्यम या उच्च वर्ग से जुड़े हों, उछाल रहा है, उसे देखते हुए महिलाएं ऐसी घटनाओं की शिकायत करने से और भी झिझकेंगी।

kalpu.sharma@gmail.com

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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