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कर्नाटकः भाजपा के संकटों का एक साल

खुद के बूते पर बनी किसी दक्षिणी राज्य की पहली भाजपा सरकार ने अपनी पहली सालगिरह मनाई। कर्नाटक की सरकार की इस सालगिरह की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी दौरान हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया।

हालांकि बाकी देश के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी खराब रहा, यही कारण है कि इसका कोई जोरदार समारोह नहीं हुआ। वैसे एक दूसरा कारण यह भी है कि भाजपा की राज्य इकाई में काफी मतभेद भी हैं। इसी के चलते जो समारोह हुआ भी, उससे सात मंत्री नदारद रहे, जिसे लेकर पार्टी को शर्मिदगी को सामना भी करना पड़ा। इसके एक हफ्ते बाद जब एक और समारोह मैसूर में हुआ तो वहां भी यही हाल था। अखबारों में भले ही एक पूरे पेज का विज्ञापन निकला, लेकिन साथ ही यह अफवाह भी चल निकली कि मुख्यमंत्री येदयुरप्पा की कुर्सी जाने वाली है।
हालांकि मुख्यमंत्री के तौर-तरीके को लेकर पहले भी पार्टी के लोगों की नाराजगी दिल्ली पहुंचाई जाती रही लेकिन सालगिरह के मौके पर सार्वजनिक रूप से छवि को जो नुकसान पहुंचा उसे लेकर केंद्रीय नेतृत्व के कान भी खड़े हो गए। पार्टी के महासचिव अरुण जेटली को तुरंत ही बंगलुरु रवाना किया गया, लेकिन इन मंत्रियों में से कई ने उन्हें नजरंदाज ही कर दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री को असंतुष्ट मंत्रियों से दूसरे दौर की बात करनी पड़ी, ताकि हालात को बहुत ज्यादा बिगड़ने से बचाया जा सके।

वैसे तो मुख्यमंत्री इस बात को लेकर हमेशा ही विवाद में रहे हैं कि वे अपने मंत्रियों तक से नहीं मिलते, लेकिन उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्री शोभा करंड्लजे को अतिरिक्त महत्व देकर अपने लिए और दुश्मन पैदा कर लिए हैं। हालांकि सूचना विभाग करंड्लजे के पास नहीं है, लेकिन मंत्रिमंडल की बैठक के बाद वे ही हमेशा मीडिया से बात करती हैं। फिर जिस तरह से उन्होंने विधानसभा में अपनी पार्टी की सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए दलबदल कराया, उसे लेकर भी कई मंत्री और विधायक उनसे खफा हैं। 224 सदस्यों वाली विधानसभा में पार्टी की सिर्फ तीन सीटें ही कम थीं, येदयुरप्पा ने अपनी सरकार छह निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेकर बनाई थी। ये विधायक मंत्रिपद की शपथ लेने के बाद भी अपनी स्वतंत्र हैसियत बनाए रखना चाहते थे। लेकिन ये विधायक आगे चलकर कोई परेशानी न खड़ी करें, इसे सोचकर मुख्यमंत्री ने दूसरी पार्टियों से दलबदल के लिए ऑपरेशन कमल किया। इसके तहत कांग्रेस और जनतादल के विधायकों को भाजपा में शामिल होने के लिए ललचाया गया। इसे लेकर भी कई विधायकों में नाराजगी है, खासतौर पर उन विधायकों में, जो लगतार तीन-चार बार से विधायक बन रहे हैं, लेकिन मंत्रिपद के लिए उन्हें नजरंदाज किया गया, जबकि दूसरे दलों से आने वालों को शपथ दिला दी गई। येदयुरप्पा को उम्मीद थी कि पार्टी के विधायक इस बहुमत न होनेकी मजबूरी को समझेंगे। 

पार्टी ने बहुमत तो हासिल कर लिया, लेकिन समस्या अब कई तरह से सर उठाने लगी है। बेलारी के रेड्डी बंधुओं ने मुख्यमंत्री के खिलाफ आस्तीने चढ़ा ली हैं। तीनों रेड्डी बंधु- जनार्दन, करुणाकर और सोमशोखर येदयुरप्पा के मंत्रिमंडल में शामिल हैं। वे खदान के धंधें के धुरंधर हैं और अपने व्यवसायिक हितों को हमेशा ही राजनैतिक निष्ठा से ऊपर रखते हैं। उनके व्यसायिक हित आंध्र प्रदेश में भी हैं और कर्नाटक में व्यवसायिक के साथ ही राजनैतिक हित भी। इन भाइयों के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे अपने हितों के लिए अक्सर ही दोनों राज्यों की सीमा रेखा को इधर-उधर करते रहते हैं। साथ ही उन पर रिजर्व फॉरेस्ट पर कब्जे का भी आरोप है। ये मसले दोनों ही राज्यों की विधानसभाओं में उठते रहे हैं। लेकिन अब केंद्र में यूपीए सरकार की वापसी के साथ ही उन पर दबाव बढ़ गया है। उनके खनन के कारोबार पर खतरा मंडरा रहा है, बचने का तरीका सिर्फ यह है कि वे कांग्रेस से नजदीकी रिश्ता बनाएं। आंध्र के मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी से उनके रिश्ते अच्छे हैं इसलिए इसमें कोई ज्यादा दिक्कत नहीं है। लेकिन कर्नाटक में यह इतना आसान भी नहीं है। वहां की भाजपा सरकार में उनके बहुत बड़े दांव लगे हुए हैं। येदयुरप्पा को भी राज्य की राजनीति में उनकी अहमियत का पता है। इसी वजह से राज्य मंत्रिमंडल ने उनके जिले बेलारी में सड़कें बनाने के लिए 26 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। उनको रियायत और ज्यादा अहमियत देकर ही वे उस असंतोष को काबू कर सकते हैं, जिसकी अगुवाई रेड्डी बंधु कर रहे हैं। भाजपा की एक चिंता यह भी है कि लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे प्रदर्शन के बाद कांग्रेस अब राज्य में खुद को मजबूत बनाने में जुट गई है।

radhaviswanath73@yahoo.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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