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क्या है भाग्य

पिछले दिनों कई परिचित बच्चों के रिजल्ट निकले, कुछ तो पास हो गए, कुछ फेल भी हो गए। मैंने महसूस किया जो बच्चे अच्छे नम्बरों से पास हो गए थे, उनके परिजन बार-बार यही कह रहे थे, उसने बहुत मेहनत की थी, उसकी मेहनत रंग लाई, पास तो उसे होना ही था। पर जहां बच्चे फेल हो गए थे, वहां सुनने को मिला मेहनत तो बहुत की थी, पर क्या कहें? इसका भाग्य ही खराब है अतः कुछ नहीं हो पाया। यह बिडम्बना ही है कि मनुष्य को जब सफलता मिलती है, तब वह भाग्य की बात नहीं करता, पर जब वह असफल होता है, तब सारा दोष भाग्य पर मढ़ दिया जाता है। स्पष्ट है सफलता में उसे अपना पुरुषार्थ दिखता है, पर असफलता का दोष वह अपने खोटे भाग्य में देखने लगता है। तब उसे अपनी मेहनत में कमी नहीं दिखती। असफल व्यक्ति में भाग्यवादी बनने की प्रवृत्ति होती है, वह अकर्मण्यता की ओर जाने लगता है। पर आपने देखा होगा वायु सदा बहती है, जिन नावों के पाल खुले होते हैं, वायु उनका साथ देती है, वे आगे बढ़ जाती हैं। पर जिनके पाल नहीं खुले होते, उन पर वायु का असर नहीं होता, वो जहां की तहां खड़ी रहती हैं। तो क्या यह वायु का दोष है? स्वामी विवेकानंद ने असफलता को भी सकारात्मक माना है, उन्होंने कहा- असफलता से निराश न हों, उससे ही ज्ञान का उदय होता है। हममें कहां कमी है, इसका भान होता है। अनन्त काल हमारे सम्मुख है, फिर हताश क्यों हो? बहुत से उदाहरण हैं जैसे मूर्ख कालिदास महाकवि कालिदास हो गए, पत्नी की डांट खा कर तुलसीदास हताश थे, पर रामायाण की रचना ने उन्हें अमर बना दिया। हमारे अपने ही कर्म उस शक्ति का निर्माण करते हैं, जिसे भाग्य के नाम से पुकारा जता है। अतःअपने भाग्य को बनाने-बिगाड़ने का सारा दायित्व हमारा अपना ही है। ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं।

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