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न्यायिक सुधार पर ठोस कदम उठाएगी सरकार

न्यायिक सुधार पर ठोस कदम उठाएगी सरकार

न्यायपालिका में बहुप्रतीक्षित सुधारों के संबंध में विभिन्न दलों की चिंताओं  से सहमति जताते हुए केन्द्र सरकार ने इस मसले पर अगले कुछ  महीनों में ठोस कदम उठाने का आश्वासन दिया, लेकिन साथ ही कहा कि सरकार न्यायपालिका से किसी भी प्रकार के टकराव  के पक्ष में नहीं है।

विधि और न्याय मंत्री वीरप्पा मोइली ने गुरुवार को लोकसभा  में प्रश्नकाल में विभिन्न दलों के सदस्यों के सवालों के जवाब में कहा कि न्यायिक सुधारों की देश में लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही है और सरकार इस मुद्दे पर खुले दिमाग से सोच रही है।

मोइली ने कहा कि मैं आपको आश्वासन दे सकता  हूं कि हमें न्यायिक सुधार के मामले में एक तार्किक नतीजे पर पहुंचने की जरूरत है और इस काम में अब अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि पहले ही कई साल लग चुके हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें संसद, विपक्ष न्यायधीशों और अन्य संबंधित पक्षों को विश्वास में लेना होगा और सर्वसम्मति बनानी होगी।

मोइली ने समाजवादी पार्टी के शैलेन्द्र सिंह के इस विचार से सहमति जतायी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक  पारदर्शिता होनी चाहिए। मोइली ने विलास मुत्तेमवार के मूल प्रश्न के उत्तर में बताया कि विधि आयोग ने अपनी 214वीं रिपोर्टे में यह सुझाव  दिया है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  की नियुक्ति में भारत के प्रधान न्यायमूर्ति की प्रमुखता और कार्यपालिका की शक्ति को पुऩःस्थापित किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि विभाग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने  भी 1993 से पूर्व की स्थिति को पुनःस्थापित करने की सिर्फारिश की थी, जिसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों ही शामिल होते हैं और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के विषय में कार्यपालिका की प्रमुखता है।

विधि मंत्री ने बताया कि समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के कार्य को कालीजियम से भिन्न  किसी वृहतर निकाय को सौंपा जाना चाहिए, जिसमें न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों के प्रतिनिधि शामिल हों। उन्होंने बताया कि सरकार देश में न्यायिक सुधारों के लिए  एक योजना तैयार करने की प्रक्रिया कर रही है। इस उद्देश्य  के लिए सरकार ने व्यापक सलाह मशविरा शुरू कर दिया है और इसके बाद इस संबंध में अंतिम राय बनायी जाएगी।

न्यायाधीशों की पदोन्नति के मामले में अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग से संबंधित न्यायाधीशों के साथ  भेदभाव बरते जाने संबंधी शिरोमणि अकाली दल की परमजीत कौर  गुलशन के सवाल के जवाब में विधि मंत्री ने कहा कि सोशल इंजीनियरिंग कोई दान नहीं है बल्कि यह अधिकार है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने देश के प्रधान न्यायाधीश से भी  अपील की है कि पदोन्नति के मामले में इस बात पर विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि न्यायिक सुधारों को लेकर जो समग्र अवधारणा  विकसित की जा रही है, उसमें इन सब बातों का ध्यान रखा जाएगा।

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