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एसोफेगल एट्रेशिया

हाल में मुजफ्फरनगर वासी तीन वर्षीय कृष वधवा का दिल्ली के डॉक्टरों ने इलाज किया। कृष के शरीर में जन्म से ही खाद्यनली नहीं थी। इस बीमारी को ऐसोफेगल एट्रेशिया (ईए) कहा जाता है। यह ऐसा रोग है जो बच्चे में जन्म से ही होता है। इस रोग में बच्चे में खाद्यनली नहीं होती। डॉक्टरों के अनुसार चार हजार में से एक बच्चे में यह रोग होता है।

जिन शिशुओं को यह रोग होता है, वह तरल भोजन निगल लेते हैं, लेकिन खांसी के साथ ही भोजन उनके नाक या मुंह से बाहर आ जाता है। ऐसे में ऑक्सीजन के अभाव में बच्चे का रंग नीला पड़ता है और उसकी सांस रुक जाती है। बच्चे की श्वास लेने की क्षमता का अंदाज लगाने के लिए उसमें कैथेटर डाला जाता है। जिससे एक्स-रे फिल्म के जरिए समस्या की गहराई का पता चलता है।

ऑपरेशन से ही उपचार:  ईए का उपचार ऑपरेशन से ही संभव है। जसा कि कृष के मामले में डॉक्टरों ने किया था। डॉक्टरों ने पिछले ऑपरेशनों के दौरान कृष के सीने में किए गए एक छेद को भी भरा जिसका काम कृष द्वारा अंदर निगले जने वाले थूक का निकास करना होता था। पिछले दो ऑपरेशनों में कृष के सीने के अंदर एक पाइप डाली गई थी जिसकी मदद से वह थूक गटकता था।

इसी तरह के अन्य पाइप के जरिए वह एक वर्ष तक खाना खाता रहा था। यह पाइप भी ऑपरेशन के जरिए कृष के पेट में लगाया गया था। डॉक्टरों के अनुसार अब कृष पूरी तरह से स्वस्थ है और वह भोजन कर सकता है। मानव शरीर में खाद्यनली को ऑपरेशन के तौर पर स्थापित करने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। इसके लिए बच्चे के जन्म के कुछ ही घंटों के बाद ऑपरेशन करना पड़ता है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि बच्चे के शरीर में खाद्यनली की कमी का पता समय से चल पाए।

ईए से ग्रसित बच्चों की सजर्री में डॉक्टरों को अन्य अंगों जसे रीढ़, हृदय और गुर्दो पर भी ध्यान देना होता है। ऑपरेशन के बाद बच्चे को विशेष देखरेख में रखना भी जरूरी होता है।

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