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लाल फीतों के नंदन कानन में नीलेकणी

जब से यह समाचार मिला है कि इन्फोसिस कंपनी के साथ उसकी स्थापना से जुड़े भारत में सूचना क्रांति के अगुवाओं में प्रमुख नंदन नीलेकणी की नियुक्ति कैबिनेट मंत्री के पद के साथ योजना आयोग के अन्तर्गत एक और आयोग के अध्यक्ष के रूप में की गई है, देशभर में जागरूक जिम्मेदार नागरिकों में अनोखा उत्साह देखने को मिल रहा है। पहली बार किसी टेक्नोक्रेट उद्यमी को बिना राज्यसभा वाली पिछले दरवाज़े की सीढ़ी चढ़ा इतने ऊंचे ओहदे पर बिठाया गया है।

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में दूरसंचार के क्षेत्र में तहलका मचा देने वाले सैम पित्रोदा को टेलीकॉम कमिशन का अध्यक्ष भी कुछ इसी तरह बनाया गया था, पर उन्हें सिर्फ राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था। सैम को नीचा दिखाने और असफल बनाने के लिए दिग्गज राज नेताओं ने जायज-नाजायज सभी हथकंडे अपनाए थे। राजीव के देहांत के बाद उन्नीकृष्णन जैसे मंत्री ने उनका काम दूभर कर डाला था। खिन्न पित्रोदा वापस अमेरिका लौट गए। यह देखने लायक होगा कि भारतीय राजनीति में और नौकरशाही में न्यस्त स्वार्थ अपने नंदन कानन में बाहर से आये नीलेकणी का स्वागत किस तरह करते हैं।

नीलेकणी की योग्यता, असाधारण प्रतिभा और कार्य कौशल के बारे में दो राय नहीं हो सकती। नारायण मूर्ति के साथ जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना उन्होंने की , वह आज सिर्फ अपार मुनाफा कमाने के लिए ही विश्वविख्यात नहीं बल्कि ईमानदारी और पारदर्शिता जैसे मूल्यों में निष्ठा के कारण भी बेमिसाल समझी जाती है। नंदन और नारायण मूर्ति तथा उनके अन्य सहयोगी अपनी साख को ही सबसे मूल्यवान पूंजी समझते रहे हैं।

सरकार में शामिल होने के साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में वह कोई समझोता करने वाले नहीं। उन्हें लाल बत्ती वाली गाड़ी नहीं चाहिए और न ही बाकी ताम-झम की दरकार है, जिसके बिना कोई भी अतिविशिष्ट व्यक्ति अपनी हस्ती बचा नहीं सकता। बड़ा दफ्तर, बंदूकधारी, अंगरक्षक और सायरन बजाती लाल बत्ती चमकाती गाड़ी ही न हो तो फिर कैबिनेट मंत्री का दर्जा पाने का मजा ही हमारे शासकों के लिए किरकिरा हो जाता है।

दिक्कत यह है कि नंदन नीलेकणी जैसा आत्म-विश्वास और पद के साथ जुड़ी सुविधाओं के प्रति त्याग का भाव उनके सहयोगियों में अपने आप नहीं पैदा होगा और यह उद्यमी निजी क्षेत्र की कार्यकुशल शैली में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह जैसे करेगा उसका अनुसरण करना भी कठिन होगा। अभी तक जिस-जिस मंत्री ने अपना काम पेशेवर कौशल और पारदर्शिता से करने की कोशिश की है, उसे लंगड़ी मारने का या कोहनी कोचने का अभियान सहयोगी मंत्री ही करने लगते हैं।

नंदन नीलेकणी के संबंध में ही कुछ और बाते विचारणीय हैं। जिस विशिष्ट-अनूठे परिचय सूचकांक आयोग (यूनीक आईडेंटीफिकेशन डिजिटल कमीशन) का अ-अनूठे परिचय सूचकांक आयोग (यूनीक आईडेंटीफिकेशन डिजिटल कमीशन) का अध्यक्ष उन्हें बनाया गया है, उसे योजना आयोग के अन्तर्गत काम करना है। कुछ लोग इसका यह अर्थ निकाल रहे हैं कि उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के आधीन काम करना होगा। योजना आयोग के उपाध्यक्ष का दर्जा खुद कैबिनेट मंत्री का है। बात साफ है एक म्यान में दो तलवारें और एक मांद में दो शेर एक साथ भला कैसे रह सकते है।

वर्तमान योजना आयोग के उपाध्यक्ष खुद बड़ी हस्ती हैं और वह अपने को वित्तमंत्री से कम अहमियत का नहीं समझते। और समङो भी क्यों नहीं? यहां ओहदा ही व्यक्ति की हैसियत या हस्ती तय करता है। अमेरिका या सिंगापुर में व्यक्ति की योग्यता अनुभव और प्रतिभा के अनुसार उसे जिम्मेदारी सौंपी जाती है। व्यक्ति विशेष के कारण कुर्सी की गरिमा बढ़ती है। अपने यहा किस्सा कुर्सी का बिल्कुल फर्क है। आज जो व्यक्ति हमारे प्रधानमंत्री हैं, वह कभी प्रणब मुखर्जी के ‘अधीन’ कर्मचारी के रूप में काम कर चुके हैं और उन दिनों वित्तमंत्री के सलाहकार जयराम रमेश भी नौकरशाहों की नज़र में मनमोहन सिंह से अधिक वज़नदार असरदार हस्ती थे। इस बात से डॉ. मनमोहन सिंह की कार्यशैली या कार्यकुशलता में रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ा है।

जो सवाल पूछा जाना चाहिए वह यह है कि यह नया प्रयोग क्या नंदन नीलेकणी तक ही सीमित रहेगा या इसे एक नई सार्थक परंपरा का आरंभ भी समझ जा सकता है? क्या निकट भविष्य में निजी क्षेत्र में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके और भारतीय उद्यमी भी सिर्फ सलाहकार की हैसियत से नहीं, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) वाले अधिकारों के साथ वास्तव में कुछ कर दिखाने के लिए सरकार में शामिल किये जायेंगे? यदि वास्तव में ऐसा होता है तो यह एक नई पहल होगी। तब भी कुछ सवाल बचे रहेंगे।

कैबिनेट मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं और संसद के प्रति जबावदेह भी। जिस व्यक्ति का ओहदा कैबिनेट मंत्री का हो पर वह बाकायदा कैबिनेट मंत्री न हो तो ऐसी कोई बाध्यता उस पर नहीं रहती। सैम पित्रोदा का जिक्र पहले किया जा चुका है। अभी हाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिये जाने से भी कुछ लोगों की नज़र में एक खास तरह का संवैधानिक संकट पैदा होने लगा है। सबसे बड़ी चुनौती यथास्थिति पोषक जड़ता को बरकरार रखने वाली स्वार्थ साधक नौकरशाही के मिजाज बदलने वाली है।

जिस अश्वमेध के आयोजन का जिम्मा नंदन नीलेकणी को सौंपा गया है, वह खासा विराट है। एक अरब अट्ठारह करोड़ हिन्दुस्तानियों के लिए अनूठे परिचायक वाले स्मार्ट कार्ड एक समय सीमा के भीतर सुलभ कराना आसान नहीं। कठिनाई सिर्फ तकनीकी नहीं। सबसे बड़ी अड़चन न्यस्त स्वाथरें और भ्रष्ट अफसरों तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा पैदा की जायेगी। एक बार इस तरह के परिचय पत्र से नागरिक को लैस कर देने के बाद सरकार के लिए अपनी कार्यवाही को अपारदर्शी रखना असंभव हो जाएगा। क्या कोई भी शासक वर्ग इसके लिए तैयार होगा?

कुछ समय पहले जब मतदाता पहचान-पत्र सुलभ कराने का काम बड़ जोर-शोर से शुरू किया गया था, तब भी यही बात सामने आई थी। जो व्यक्ति पासपोर्ट ड्राइविंग लांइसेंस या राशन कार्ड हासिल करने की लम्बी और दर्दनाक लड़ाई ङोल चुका है, आसानी से यह समझ सकता है कि इस नये परिचय-पत्र को लेकर दफ्तरों में कितनी उथल-पुथल मच सकती है। कुछ लोगों को चिन्ता यह भी है कि इस तरह के कार्ड का सहारा लेकर कोई तानाशाह सरकार अहसहमति और असंतोष प्रकट करने वाले नागरिकों का उत्पीड़न भी कर सकती है। यह आशंकाएं तत्काल निराकरण चाहती हैं। बहरहाल नीलेकणी का इस लाल फीते वाले ठंडे बस्तों के नंदन कानन में स्वागत है।

pant @ gmail. com

लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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