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दो टूक

सम्मोहन कहें, वशीकरण कहें या इंद्रजाल कहें। ये बजट है बिलकुल जादूगर के खेल जैसा! सबको पता है जो दिखाया जा रहा है, भ्रम है। नजर का धोखा है। फिर भी सब खुश हैं। तालियां बजा रहे हैं। जरा सोचिए वित्तमंत्रियों के खेल कितने निराले होते हैं। खुद ही एफबीटी लगाया। फिर खुद ही हटा दिया। मगर कॉपरेरेट में वाह-वाही हो गई। खुद सरजर्च थोपा। खुद ही उठा लिया। पर करदाता भांगड़ा करने लगे!

सच्चाई सबको पता है। रियायत-वियायत कुछ नहीं होती। आखिर में मुंडना भेड़ को ही होता है। घोड़ा घास से यारी नहीं करता। सरकार का टैक्सपेयर से कैसा याराना। वोटर को शुक्रिया कहना था तो दस हजार की छूट से आंसू पोंछ दिए। ऊंट के मुंह में जुगाली के लिए जीरा डाल दिया। लेकिन पब्लिक को सलाम जो सब कुछ समझते हुए भी मस्त है। रोमांचित है। हमको मालूम है बजट की हकीकत, लेकिन दिल के बहलाने को गालिब तमाशा अच्छा है।

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