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भारतीय युवाओं के लिए समलैंगिकता को स्वीकार करना आसान नहीं

दिल्ली उच्च न्यायालय ने भले ही व्यस्कों के बीच रजामंदी पर आधारित समलैंगिक रिश्तों को अपराधमुक्त करने का फरमान जारी कर दिया हो लेकिन भारतीय युवाओं के लिए समाज में इसे स्वीकार करना अभी भी मुश्किल बात है।
 

एमबीए की पढ़ाई कर रहे 23 वर्षीय समूल जॉन का मानना है कि समलैंगकिता के बारे में भारतीय लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आएगा। जॉन ने कहा कि अदालत का फैसला लोगों को पुरुष समलैंगिक (गे) अथवा महिला समलैंगिक (लेसबियन) के प्रति सहानुभूति प्रकट करने में कोई मद्द नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि आपके घर में यदि कोई ऐसा व्यक्ति हो तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे। क्या आप यह मानते हैं कि अदालत के फैसले से पहले इस समुदाय के लोग आपस में यौन संबंध नहीं बनाते होंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। बल्कि इसके विपरीत महिला का महिला से और पुरुष का पुरुष से आपसी सहमति से यौन संबंध का सिलसिला हमेशा रहा है।

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