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क्या गुल खिलाएगी ग्रहण की हैट्रिक

इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण 22 जुलाई को दिखाई देगा, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि कई वर्षो बाद 7 जुलाई से 6 अगस्त के एक महीने के अंतराल में एक के बाद एक तीन ग्रहण लगातार आने वाले हैं। कल चंद्रग्रहण, 22 को सूर्यग्रहण और 6 अगस्त को चंद्रग्रहण पड़ने का पूरी दुनिया पर क्या असर होगा, इसके बारे में ज्योतिषियों और खगोलविदों की राय अलग-अलग है। कुछ ज्योतिषी इस स्थिति को काफी गंभीर बता रहे हैं।

इस वर्ष को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतर्राष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमी वर्ष के तौर पर घोषित किया है। 400 वर्ष पहले गैलीलियो ने टेलीस्कोप के द्वारा खगोलीय घटनाओं को देखा था। इस साल को खगोलीय घटनाओं की 400वीं शताब्दी वर्ष के रूप में भी मनाया जा रहा है। इस वर्ष भारत भी इस घटना का कई वजहों से साक्षी बनने जा रहा है। इसी वर्ष 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण भी दिखाई पड़ेगा। यही नहीं 7 जुलाई से 6 अगस्त के बीच तीन ग्रहण भी लग रहे हैं।

2009 में ग्रहण 
वर्ष 2009 में छह ग्रहण पड़ेंगे। दो सूर्य और चार चंद्रग्रहण। 2009 में पहला सूर्यग्रहण 26 जनवरी को पड़ा था, लेकिन यह आंशिक था। यह ग्रहण पूर्ण रूप से आस्ट्रेलिया में देखा गया था। दूसरा सूर्यग्रहण 22 जुलाई को पड़ेगा। यह पूर्ण होगा। इसका पथ मध्य चीन और उत्तरी भारत के ऊपर से होगा। पहला चंद्रग्रहण 9 फरवरी, दूसरा 7 जुलाई, तीसरा 6 अगस्त और चौथा 31 दिसंबर को पड़ेगा। 7 जुलाई को पड़ने वाला चंद्रग्रहण ऑस्ट्रेलिया, प्रशांत महासागर और अमेरिका में दिखाई देगा, तो 6 अगस्त वाला चंद्रग्रहण अमेरिका, यूरोप, पश्चिमी एशिया और अफ्रीका में। 7 जुलाई को पड़ने वाले आंशिक चंद्रग्रहण को नंगी आंखों से देखना संभव नहीं होगा।

22 जुलाई को पड़ेगा सूर्यग्रहण
इस सूर्यग्रहण की शुरुआत भारत के पश्चिमी तटीय इलाके सूरत से होगी। उसके बाद यह उत्तरी भारत, भूटान और चीन में दिखाई देगा। संपूर्णता के लिहाज से यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण है। यह 6 मिनट और 39 सेकेंड अवधि का होगा। इस दौरान सूरज सिर्फ एक छल्ले जैसा दिखाई देगा। सूरत में यह ग्रहण तीन मिनट चौदह सेकेंड दिखाई देगा। बिहार में इस ग्रहण के दिखने की अवधि चार मिनट की होगी।

भारत में पूर्व की ओर इसका समयकाल बनिस्पत लंबा होगा। इंडोनेशिया में भी आंशिक रूप से सूर्यग्रहण दिखाई देगा। आंशिक रूप से सूर्यग्रहण पूर्वी एशिया के ज्यादातर हिस्सों और हवाई में भी दिखाई देगा। यह भी उम्मीद है कि नवंबर के मध्य में ल्यूनिड उल्कापिंडों की बौछार हो सकती है। 2009 का यह दूसरा सूर्यग्रहण होगा। पहला सूर्यग्रहण 26 जनवरी को
पड़ा था।

जुलाई में भारत में पड़ने वाला पूर्ण सूर्यग्रहण सूरत, अरुणाचल प्रदेश, इलाहाबाद, सिलीगुड़ी, पटना, गया, दाजिर्लिंग, भोपाल में दिखाई देगा। हालांकि उस दौरान दाजिर्लिंग और सिलीगुड़ी में बारिश का मौसम रहता है। इसके बाद भारत में पूर्ण सूर्यग्रहण 20 मार्च, 2034 में दिखाई देगा।

भारत समेत नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार व चीन में देखा ज सकेगा। इन देशों से होता हुआ सूर्यग्रहण का मार्ग प्रशांत महासागर से जपान के युक्यरू तक पहुंचेगा। वज्ञानिकों का कहना है कि यह सूर्यग्रहण सबसे अधिक स्पष्ट प्रशांत महासागर के क्षेत्र में दिखाई देगा। सूर्यग्रहण के कुछ क्षण पहले चांद की छाया पश्चिम से पूर्व की तरफ दौड़ती नजर आएगी और समाप्ति से चार मिनट पहले पूर्व से पश्चिम की ओर वापस जएगी।

21वीं सदी में सूर्यग्रहण
नासा स्पेस फ्लाइट सेंटर के अनुसार 21वीं सदी में कुल 224 सूर्यग्रहण पड़ेंगे। इनमें 68 पूर्ण सूर्यग्रहण लगेंगे। 22 जुलाई को लग रहा सूर्यग्रहण पिछले 15 वर्ष में भारत में दिखाई देने वाला तीसरा पूर्ण सूर्यग्रहण होगा। पहले 1995 और 1999 में सूर्यग्रहण दिखा था।

सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण
खगोलीय दृष्टि से सूर्यग्रहण चार तरह के होते हैं। आंशिक, वलयाकार, हाइब्रिड तथा पूर्ण। सूर्यग्रहण के दौरान सूर्य और पृथ्वी के बीच चांद आ जता है, लेकिन जब पूरी तरह से चांद सूरज को ढक लेता है, तो पूर्ण सूर्यग्रहण की स्थिति पैदा होती है। आमतौर पर वलयाकार सूर्यग्रहणों की अवधि लंबी होती है, लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण तीन-चार मिनट से ज्यादा लंबे नहीं होते। तकरीबन वर्ष में दो से पांच सूर्यग्रहण पड़ते हैं, लेकिन सूर्य की छाया पृथ्वी की जिस दिशा में होती है, वहीं यह नजर आता है। साथ ही यह भी जरूरी नहीं कि हर बार सूर्यग्रहण का प्रभाव पृथ्वी पर दिखाई ही दे। 1934 में पृथ्वी पर पांच बार सूर्यग्रहण देखा गया था, अब यह घटना दोबारा 2206 में देखने को मिलेगी। चंद्रग्रहण के दौरान सूर्य और चांद के बीच में पृथ्वी आ जाती है जिस कारण पृथ्वी सूर्य की रोशनी को चांद पर पहुंचने से रोकती है।

कब-कब पड़े तीन ग्रहण
पूरा विश्व एक माह में तीन ग्रहणों का साक्षी बनेगा। पहला चंद्रग्रहण 7 जुलाई को दिखेगा, दूसरा 22 जुलाई और तीसरा 6 अगस्त को लगेगा। पहला ट्रिपल ग्रहण 3067 ईसा पूर्व (कॉमन इरा के पहले) में पड़ा था। इससे पहले 1915, 1916, 1917 के दौरान ट्रिपल सूर्यग्रहण पड़ा था। 1935 के दौरान भी ट्रिपल ग्रहण पड़ा था। इसके अलावा, 1940, 1942, 1944 के दौरान भी तीन ग्रहण पड़े थे।

ग्रहण में ही उदय होगा सूर्य
वज्ञानिकों का कहना है कि 22 जुलाई को सूर्योदय ग्रहण के साथ ही होगा यानी जब सुबह पांच बजे सूर्योदय होगा, तब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ चुका होगा, लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण लगभग एक घंटे बाद शुरू होगा।

मानसून डाल सकता है बाधा
मानसून की वजह से सूर्य ग्रहण की पूर्णता देखने और उसके अध्ययन में दिक्कतें आ सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी वजह से भारत के कुछ क्षेत्रों में सूर्यग्रहण को देखने में भी परेशानी आ सकती है। जानकारों की मानें, तो पटना, वाराणसी और इसके आस-पास के इलाकों में इसके बेहतर दिखने की काफी संभावनाएं हैं।

सूर्यग्रहण का दीदार करने के लिए तमाम योजनाएं 
21वीं सदी के सबसे बड़े सूर्यग्रहण को देखने के लिए वैज्ञानिकों, खगोलविदों ने कई योजनाएं बना रखी हैं। खगोलविदों के एक दल ने चीन के पहाड़ी क्षेत्र हांगझऊ के पास अंजी जाने की योजना बना रखी है, जहां से वह सूर्यग्रहण के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। वहीं कुछ खगोलविद् स्पेशल फ्लाइट से इसकी पूर्णता को देखेंगे।

भारत में पहली बार सूर्यग्रहण को देखने के लिए कॉक्स एंड किंग्स ने बोइंग विमान की व्यवस्था की है, लेकिन इस विमान से सूर्यग्रहण को देखने के लिए आपको 29,000 से 79 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं। इस दौरान आप नजदीक से सूर्यग्रहण देखने के साथ उसका फोटो भी खींच सकेंगे। सूर्यग्रहण देखने का मौका देने वाली ये उड़ान तीन घंटे की होगी। ग्रहण की प्रक्रिया के मध्य में यह विमान 41,000 फीट की ऊंचाई पर होगा। वज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि ग्रहण के दौरान सूर्य से किसी भी तरह का हानिकारक विकिरण नहीं होता है, लेकिन फिर भी ग्रहण के आंशिक भाग को देखते समय सोलर फिल्टर का इस्तेमाल जरूर करें।

अलग-अलग हैं मान्यताएं
ग्रहण को लेकर ज्योतिषियों का अलग नजरिया है। वे आमतौर पर इनको किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत मानते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इस बात को सिरे से नकारते रहे हैं। ज्योतिषियों का कहना है कि जब भी एक साथ तीन सूर्यग्रहण पड़ते हैं, तो कुछ अनिष्ट होता है। 1915, 1916, 1917 के दौरान जब तीन ग्रहण पड़े थे, तब प्रथम विश्वयुद्ध हुआ था। 1940, 1942, 1944 में भी तीन ग्रहण लगे थे, उस समय हुए द्वितीय विश्व युद्ध दुनिया को झेलना पड़ा था। ज्योतिषी कहते हैं कि इतिहास में अगर थोड़ा पीछे जाएं, तो आपको ग्रहण के अशुभ होने के और उदाहरण मिल जाएंगे।

3067 ईसा पूर्व में जब तीन ग्रहण पड़े थे, तब महाभारत का युद्ध हुआ था। उस दौरान 29 सितंबर, 3067 को चंद्रग्रहण पड़ा था, 14 अक्तूबर, 3067 को सूर्यग्रहण पड़ा था और 28 अक्तूबर, 3067 को चंद्रग्रहण पड़ा था। ज्योतिषी बताते हैं कि महाभारत काल में ही द्वारिका में आई बाढ़ की घटना के दौरान भी तीन ग्रहण पड़े थे। वहीं कई जानकारों का कहना है कि ये कहना सही नहीं होगा कि ग्रहण का प्रभाव हमेशा अशुभ या अनिष्ट ही होता है। पहले ट्रिपल ग्रहण के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का उद्भव हुआ था।

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