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प्री-बजट पत्रकारिता

बजट के पहले आर्थिक और बिजनेस की खबरों का सूचकांक अचानक बढ़ जाता है। इन दिनों हिंदी अखबारों में भी आर्थिक खबरें पहले पेज पर स्थान पाने लगती हैं। हर अखबार प्रायः प्री-बजट कवरेज के लिए विशेष अभियान शुरू करता है। अक्सर इसे खास नाम दिया जाता है- जैसे रन टू बजट, काउंट डाउन, बजट स्पेशल। इनमें खबरों और लेखों को ऐसे पेश किया जाता है, जैसे बजट लीक हो गया हो। जैसे एग्जाम के दिनों में पेपर लीक होते हैं। लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता है। बजट के बाद तमाम ऐसी खबरें बेबुनियाद साबित होती हैं। ऐसी अधिकांश खबरें प्रायोजित होती हैं या मांग-पत्र और इच्छाओं का सालाना संस्करण।

अखबारों की प्री-बजट कवरेज को भी वित्त मंत्री के बजट भाषण की तरह दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- पार्ट ‘ए’ और पार्ट ‘बी’। पार्ट ‘ए’ में अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकतों या बजट के समक्ष कठिनाइयों से रू-ब-रू कराने वाली खबरों को शुमार किया जा सकता है, जैसे राजस्व की क्या स्थिति है। किस मद में कर संग्रह कम हुआ या ज्यादा। या राजकोषीय घाटा काबू में है या नहीं। उद्योगों की स्थिति क्या है? मसलन लुधियाना का साइकिल उद्योग किन कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा है या आगरे के ढलाई उद्योग पर क्या खतरे के बादल मंडरा रहे हैं या कानपुर में जूता-चमड़ा उद्योग में इकाइयां बंद हो रही हैं आदि-आदि।

प्री-बजट कवरेज के पार्ट ‘बी’ में वे खबरें शामिल की जा सकती हैं, जिनमें संगठित उद्योग बजट में कुछ पाने के लिए कैसे रिपोर्टरों या अखबारों का इस्तेमाल करते हैं। इसका पूरा एक गणित है। जैसे-जैसे उदारीकरण और ग्लोबलाइजेशन का वर्चस्व बढ़ रहा है, वित्त मंत्री के भाषण का पार्ट ‘बी’ छोटा होता जा रहा है, जिसमें कर या शुल्कों की घट-बढ़ का ब्योरा होता है। जानकारों का कहना है कि आनेवाले सालों में यह हिस्सा नाम मात्र का रह जाएगा। इसके विपरीत पार्ट ‘ए’ वजनी होता जा रहा है जिसमें नीतिगत नजरिए का समावेश होता है।

अखबारों की प्री-बजट कवरेज में उल्टा हो रहा है। इसका पार्ट ‘ए’ धीरे-धीरे गौण होता जा रहा है। लोगों की दिक्कतें अब वित्त मंत्रालय के गलियारों में बड़ी मुश्किल से पहुंच पाती हैं। वित्त विधेयक के प्रावधान बनाने में वित्त अधिकारी अब ज्यादा बेफिक्र हो गए हैं। एक बानगी से इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है। यशवंत सिन्हा के वित्त मंत्री काल में बुग्गा गाड़ी में इस्तेमाल होने वाले टायर पर टैक्स जड़ दिया गया था। लेकिन वित्त मंत्री को यह मालूम नहीं था कि ऐसा कुछ हो गया है। इसी बजट में प्रिंटेड थली में मिठाई बेचने पर सर्विस टैक्स लगा दिया गया था और देसी घी पर उत्पाद शुल्क लगाया गया था। किसी रिपोर्टर ने जब इन विसंगतियों का उल्लेख उनसे किया, तब यशवंत सिन्हा जी कुर्सी से उछल पड़े और बाद में उन्होंने इन सब प्रावधानों को वापस लिया।

प्री-बजट कवरेज का पार्ट ‘बी’ ज्यादा मुखर हो गया है। आप इस हिस्से में संगठित उद्योग की लॉबिंग की खबरें या ज्यादा क्रूर शब्दों में कहें, तो प्लांटेड खबरें ज्यादा पाएंगे।

मसलन पिछले दिनों आप रियल एस्टेट सेक्टर को लेकर अनगिनत खबरें पढ़ चुके होंगे कि कैसे कर्ज की अधिक ब्याज दरों से इस सेक्टर का बेड़ा गर्क हो गया है। सच यह है कि रियल एस्टेट सेक्टर की दुर्दशा केवल कीमती मकान परियोजनाओं के कारण हुई। लेकिन अब अफोर्डेबल मकानों का गुरु मंत्र इस सेक्टर के हाथ लग गया है। कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि इसके सहारे इस सेक्टर की कई मुरादें 6 जुलाई को पेश होने वाले बजट में पूरी हो जाएं। रिटेल में एफडीआई का मसला भी कुछ इसी प्रकार का है।

ग्लोब्लाइजेशन, उदारीकरण के इस दौर में क्षेत्रीय भाषाई अखबारों की धमक सत्ता के गलियारों में काफी कम हुई है। ऐसे क्षेत्रीय अखबार अवाम की नब्ज पहचानने का एक कारगर माध्यम रहे हैं, लेकिन अब ऐसा नजर नहीं आता है। यह अखबार अपनी यह ताकत खो रहे हैं। इसका सीधा असर प्री-बजट कवरेज पर भी देखने को मिलता है, पोस्ट बजट कवरेज में भी। मसलन टू ह्वीलर पर कर्ज मिलेगा, 13 फीसदी पर, और कार पर लोन मिलेगा इससे सस्ता। इस पर भी हकीकत में अनेक बैंकों ने टू ह्वीलर पर कर्ज देने ही बंद कर रखे हैं।

लेकिन इस रवए को उजागर करने का काम भाषाई अखबार करते थे। मौजूदा आर्थिक तस्वीर को पेश करने वाली खबरें इस कवरेज में नदारद होती हैं। इनमें प्री-बजट कवरेज की दशा हिंदी महिला पत्रिकाओं जैसी हो गई है, जो अपने आलेखों का सालाना संस्करण अर्से से प्रकाशित करती रहती हैं।

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