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पुरस्कार राजा-महाराजा की संस्कृति का प्रतीक

प्रयाग की माटी में रचे बसे साहित्यकार नीलाभ अश्क ने साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित सम्मान को अस्वीकार कर साहित्यिक जगत में उफान ला दिया है। उनको यह सम्मान प्रसिद्ध लेखिका अरुंधती राय की पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ के हिन्दी अनुवाद के लिए दिया गया था। इस सम्मान को अस्वीकार करने के बाद इलाहाबाद में नीलाभ से रू-ब-रू हुए अखिलेश मिश्र।

आपने इतना प्रतिष्ठित सम्मान क्यों ठुकरा दिया?
साहित्य अकादमी की ओर से इस सम्मान की घोषणा होने के बाद न जाने किस मनः स्थिति में मैंने इसे स्वीकार करने का मन बना लिया था। अकादमी को मैंने अपनी रजमंदी भी भेज दी थी। परन्तु अंतमर्न की बात सुनकर मैंने साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर इस सम्मान को लेने से मना कर दिया है। लेखक का वास्तविक पुरस्कार उसके पाठक हैं जो मुझे मिल रहा है। मेरी प्रतिबद्धता रचनाकार होने के नाते समाज के लोग हैं। इसके लिए मैं समाज के बीच रहकर और अपने लेखन से कर रहा हूं।

पहले रजमंदी, फिर मना क्यों?
मैं पुरस्कारों का हमेशा से विरोधी रहा हू। पुरस्कार राजा-महाराजाओं के समय में अपनों को उपकृत करने के लिए दिया जाता था। वह परम्परा आज भी कायम है। लेखक का वास्तविक सम्मान उसका पाठक है। हमें तो उन्हीं का सम्मान चाहिए। पाठक जिसको दिल में बैठा लेता है उसे किसी सम्मान की जरूरत नहीं है। किसी बड़े नाम वाले साहित्यकार प्रेमचंद्र, टॉ-लस्टॉय अथवा गोर्की को कोई सम्मान नहीं मिला फिर भी उनको पाठक सम्मान से पढ़ता है। चूंकि हमारा समाज और हमारी सरकारें साहित्य और संस्कृति के समर्थन से चूक रही हैं, इसीलिए पुरस्कारों का धंधा शुरू हो गया है। यह पुरस्कार या तो लेखकों के आसू पोछने के लिए दिए जाते हैं अथवा उन्हें खरीदने के लिए। निजी पुरस्कार भी अंततः पुरस्कार देने वाले के किसी स्वार्थ की पूर्ति करते हैं।

साहित्य अकादमी के बारे में आपकी क्या राय है?
पुरस्कारों की अपनी राजनीति होती है। साहित्य अकादमी आरम्भ से ही विवादों में रही है। कहने को स्वायत्त संस्था है परन्तु वह पूरी तरह सरकारी तंत्र के नियंत्रण में है। अपने आरम्भिक दौर में 1962 में ‘झूठा सच’ के लिए यशपाल के नाम की घोषणा होने के बाद भी उनको सम्मान नहीं मिला। ऐसा इसलिए हुआ कि उस रचना में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर कुछ टिप्पणी थी। उसी साहित्य अकादमी ने 1975 में यशपाल जब मृत्यु शया पर पड़े थे तो ‘तेरी मेरी उसकी बात’ पर उन्हें पुरस्कृत करके अपने पाप का प्रक्षालन करने की कोशिश की थी। लेखिका महाश्वेता देवी, गोपीचंद नारंग और वीरेन डंगवाल जैसे लेखकों को पुरस्कार देने के मौके पर भी विवाद उभरा था। साहित्य अकादमी समेत पुरस्कार तय करने वाली समितिया जिस अलोकतांत्रिक ढंग से काम करते पाई गई हैं वह भी सबके सामने है। इसकी वजह से साहित्य अकादमी की गरिमा को नुकसान हुआ है। आखिर में अरुंधती राय ने अपनी जिस रचना ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ के लिए पुरस्कार लेने से मना कर दिया हो तो भला उसके अनुवाद ‘मामूली चीजों का देवता’ के लिए मैं यह सम्मान कैसे ले सकता हू?

सरकार से क्या उम्मीद करते हैं?
सरकार के पास साहित्य संस्कृति के लिए कोई रीति नीति ही नहीं है। सरकारों ने साहित्यकारों के लिए कुछ भी नहीं किया। कागज का दाम बढ़ गया है इसलिए पुस्तकों को आमजन तक पहुचाने के लिए समाजवादी व्यवस्था कारगर हो सकती है। आज बड़े-बड़े घराने लेखकों को सम्मान देकर अपनी ओर आकर्षित करने और आयकर बचाने का काम कर रहे हैं। कुछ लेखक ऐसे हैं जिनके बीच पुरस्कार को लेकर हाय-तौबा मची हुई है। साहित्य अकादमी यदि पुरस्कार राशि कम कर दे तो कोई भी इसको लेने आगे नहीं आएगा। यदि यही राशि दस या पचास लाख कर दें तो मारकाट की भी नौबत आ सकती है। लेखकों से सरकारें भय खाती हैं, इसलिए उन्हें आकर्षित करने की कोशिश होती है।

आज के साहित्य को आप किस प्रकार से देखते हैं?
साहित्य अपना काम पूरा नहीं कर रहा है। साहित्यकार भी निष्ठावान नहीं रहे। इसी कारण से किताबों की बिक्री के लिए लेखक सरकार के आगे-पीछे भागते हैं। सरकार के एजेंडे में साहित्यकार नहीं हैं। प्रकाशक भ्रष्ट हैं, साहित्यकारों को      पूरी रॉयल्टी नहीं देते हैं। उनके तो महल बन रहे हैं परन्तु लेखक कंगाल है। जिन विचारों-संस्कारों के लिए अपना देश जाना जाता है उसके लिए कोई नहीं सोचता है। पुरस्कारों का महत्व बढ़ने से साहित्य एवं संस्कृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इन पुरस्कारों को लेकर साहित्यकारों में आपस में घृणित स्पर्धा, विद्वेष एवं वमनस्य फैला है। साहित्यकारों की नैसर्गिक निर्भीकता खण्डित हुई है, उसमें लोभ लालच बढ़ा है।

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