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जीवन पर गंभीर मनोवैज्ञानिक असर है वास्तु का

जीवन पर गंभीर मनोवैज्ञानिक असर है वास्तु का

वास्तु अपने आप में एक रहस्यों से भरी दुनिया है। इसकी व्यापकता समय और सरहद से परे जाकर अपना प्रभाव छोड़ती है। वास्तु का संबंध महज घर से नहीं, बल्कि जिंदगी के लगभग सभी पक्षों से है। करियर की उड़ानों से लेकर जिंदगी के रूहानी और रूमानी पलों तक को यह छूता है और अपना असर छोड़ जाता है। चांद और तारों की उड़ान भरने की ख्वाहिश रखने वाले लोग भी अपने आसियाने की रचना एक ऐसी फिजा में करना चाहते हैं जहां उनके ख्वाबों को पंख लग जाए और उनकी जिंदगी में बहार आ जाए। और इसके लिए वे लेते हैं वास्तु का सहारा।

आइए, इस अहम विषय के विभिन्न पक्षों पर डालते हैं एक विहंगम दृष्टि- वास्तु शब्द की उत्पत्ति वस्तु से हुई है। वास्तु यानि जिसका कि इस सृष्टि में अस्तित्व है और अपनी मौजूदगी के कारण वह प्रभावशाली है। फिर चाहे वह प्रकृति प्रदत्त हो या मानव निर्मित। मनुष्य का जीवन मुख्यतः तीन बातों से सर्वाधिक प्रभावित होता है।

1 पंचमहाभूत तत्वः-जिनसे कि संसार व हमारे शरीर का निर्माण हुआ।
2 ग्रहःवे सितारे जो आकाश में चमकते हुए अपनी ग्रह-रश्मियों से मानव जीवन व उससे सम्बन्धित पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। यह बिन्दु इस बात को स्पष्ट करता है कि वास्तु-ज्ञान ज्योतिष नियमों के सापेक्ष कार्य करता है।
3 कॉस्मिक एनर्जी, चुम्बकीय ऊर्जा कंपनी मनुष्य के भाव एवं संवेदनाओं में सम्मिलित हैं। इन तीनों का संतुलन व समन्वय कैसे किया जाए ताकि मनुष्य जीवन और अधिक परिष्कृत एवं सुखमय हो। यही वास्तु का असली विषय है। शरीर एवं संसार का सृजन पंचतत्वों से हुआ है जिसकी पुष्टि तुलसीदास के इस कथन से होती हैं- छिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंच रहित ये अधम सरीरा। पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु इन पांच तत्वों का सन्तुलन ही प्रकृति के अस्तित्व के केंद्र में है।

जब-जब इन पंचमहाभूत तत्वों के संतुलन में विकृति आती हैं तब-तब उसका दुष्परिणाम मानव शरीर व पर्यावरण को भोगना पड़ता है। जैसा कि हमारे आयुर्वेद में वर्णित हैं- यह शरीर वात, पित एवं कफ से बना है, अर्थात जब शरीर की वायु कुपित हो जाती हैं तो वात जन्य रोग होते हें तथा शरीर में दर्द इत्यादि, अग्नि असंतुलन होता है तो गैस संबंधी परेशानियां पैदा होती हैं। हम देखते हैं कि पानी के असंतुलन से कफ व डिहाइड्रेशन का सामना करना पड़ता है, उसी प्रकार जब प्रकृति में अग्निमांद्य होता है तो भूकंप व ज्वालामुखी आते हैं, वायु प्रकोप से तूफान, आंधी एवं उनमें असंतुलन से बाढ़ व अनावृष्टियों का सामना करना पड़ता है। इन पंचमहाभूतों का जो नियर स्थान है ,उन्हे उनको प्राप्त करना जरूरी होता है।

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