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देवता क्यों नहीं सोएंगे

अपने यहां बारिश आती है और देवता सोने चले जाते हैं। दो- चार दिन के लिए नहीं, बल्कि पूरे चार महीने के लिए। कल एकादशी थी। देवशयनी एकादशी और अपने देवता सोने चले गए। अब वह चार महीने बाद कार्तिक की देवोत्थानी एकादशी पर उठेंगे। अरे भई, साल में कुल मिला कर 12 महीने होते हैं और 4 महीने देवता सोने चले जाते हैं। यह अजीब समाज है। लेकिन फिर खयाल आया कि अपने देवता हमारा ही तो ‘प्रतिरूप’ होते हैं।

गुरुदेव रवींद्रनाथ की वह पंक्ति याद आती है, ‘हम हैं, तो हमारे देवता भी हैं।’ देवता हमारे साथ चाहे जो करते हों, लेकिन हम देवताओं का मानवीकरण करते हैं। हम अमूमन आठ घंटे रोज सोते हैं। दिन के 24 घंटे में से 8 घंटे सोने में चले जाते हैं। यह भी तो एक तिहाई समय हुआ। देवता को भी हम एक तिहाई हिस्सा सुला देते हैं। हम सोते हैं, तो देवता क्यों नहीं सोएंगे? समय को चाहे दिन में बांट कर देखिए या साल में। कुल मिला कर यही एक तिहाई का समीकरण बनता है।

आषाढ़ में मेघ आने लगते हैं। बारिश का कुल मौसम अपने यहां चार महीने का होता है। यही ‘अन्नपूर्णा’ समय है। यानी खेती-बाड़ी के लिए भी है। परंपरागत तौर पर हम खेतिहर समाज हैं। अपने तमाम त्योहार उसी आधार पर बने हैं। उस समाज के लिए यह समय काम का होता है और काम के समय सिर्फ काम करना चाहिए। इधर-उधर घूमना-फिरना नहीं चाहिए। तो इस समय में जरूरी कामकाज को छोड़ कर सब करने पर मनाही है। खासतौर पर कोई शुभ काम नहीं करने चाहिए। शुभ कामों में ही सबसे ज्यादा समय खर्च होता है।

सो, आप अपना स्थान न छोड़ें। स्थान छोड़ने का मतलब है अपने काम को छोड़ना। फिर बरसात के मौसम में आना-जाना कितना मुश्किल काम होता है?

इसीलिए इस समाज ने गजब का काम कर डाला। उसने इन महीनों में अपने देवता को ही सुला दिया। विष्णु भगवान को क्षीरसागर में शयन पर भेज दिया। वाह! अब तो अपनी जगह पर टिको। खेती-बाड़ी को देखो। वही आपका बड़ा काम है। वहीं से आपकी जिंदगी में सुख-समृद्धि आएगी। और देवता प्रसन्न होंगे।

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