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दो टूक

ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब बजट का इंतजार किए बिना पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए हों। लेकिन आम बजट से सिर्फ चार दिन पहले कीमत बढ़ाने की मिसाल बड़ी मुश्किल से मिलेगी। कुछ माह पहले सरकार तीन प्रोत्साहन पैकेज लाई थी। सर्विस टैक्स समेत कई करों में फेरबदल भी हुआ था। मंदी या महंगाई के असामान्य हालात में ऐसे कदम उठें तो समझ आता है। लेकिन फिलहाल कौन सा संकट है? फिर अगर ऐसे फैसले लगातार बजट के बाहर हों तो फिर बजट की जरूरत ही क्या है? बजट सिर्फ अगले वर्ष की वित्तीय योजना नहीं होता, वह केंद्रीय नीतियों का दर्पण भी होता है। क्या पेट्रोल-डीजल की कड़वी खबरों से उसे इसलिए दूर रखा जता है कि बजट वाले दिन परोसने को सिर्फ मीठा ही मीठा हो?

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