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संत काठिया बाबा

काठिया बाबा सिद्ध संत थे। जीवन तपस्या करते बीता। सदगुरु के प्रति उनके हृदय में बड़ी निष्ठा थी। वह कहते थे- ‘सदगुरु की कृपा से ही मुक्ति प्राप्त होती है। सदगुरु के चरणाश्रय से अंतःकरण शुद्ध होता है’। संत काठिया बाबा का जन्म अमृतसर के लोनाचमारी गांव के पास एक गांव में सन् 1796 में हुआ था। उनका नाम था- रामदास। गांव में एक परमहंस रहते थे। एक दिन बालक रामदास उनके पास गया। परमहंस ने रामदास से कहा- ‘रामनाम का भजन करो। राम का नाम लेने से मनुष्य बड़ा बनता है।’ चार वर्ष के रामदास ने परमहंस की बात को मंत्र की तरह स्वीकार किया। वह अवसर मिलते ही एकान्त में बैठकर नित्य जप करने लगे। सात वर्ष की आयु में पाठशाला में प्रवेश किया और अठारह वर्ष की आयु में शिक्षा पूरी की। इस दौरान उनका मन पूरी तरह राम-नाम के जप में लीन हो चुका था। उन्होंने विवाह नहीं किया। उनकी गायत्री मंत्र में अटूट आस्था थी। उनकी तप-साधना से प्रसन्न होकर गायत्री माता ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि तुम ज्वालामुखी जाकर जप करो। वह ज्वालामुखी गए और वहां पच्चीस हजार मंत्रों का जाप किया। जब रामदास ज्वालामुखी जा रहे थे, मार्ग में देवदास नामक निम्बार्क सम्प्रदाय के सिद्ध महात्मा मिल गए। उन्होंने रामदास को संन्यास की दीक्षा दी। रामदास काठ की लंगोटी पहनते थे। इसलिए वह काठिया बाबा कहलाए। वह बड़ी कठिन तपस्या और साधना करते थे। आरंभ में वह माता-पिता के पास लौट आए, किन्तु फिर वहां मन नहीं लगा। वह गुरु के पास उत्तराखंड में जाकर रहने लगे। गुरु के प्रति असीम निष्ठा होने से, उनकी तप-साधना में भी गुरु का बड़ा महत्व सिद्ध हुआ। सदगुरु की कृपा में विश्वास ही उनकी साधना का स्वरूप था। वह कहते थे- ‘भगवान का भजन ही जीवन का श्रेय है।’ साधु संतों की सेवा वह परमधर्म मानते थे। वह कहते थे- ‘आलस्य छोड़कर भगवान के विग्रह और साधु-संतों की सेवा करनी चाहिए। भगवत् दर्शन केवल गुरु कृपा से ही होता है।’

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