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दसवीं की बोर्ड परीक्षा होनी चाहिए

मेरा मानना है कि अधिकतर बच्चे दसवीं बोर्ड परीक्षा की पढ़ाई के प्रति गंभीर होते हैं। इससे पहले घरवालों या अध्यापकों के दबाव के कारण ही बच्चे पढ़ते हैं। दसवीं बोर्ड की परीक्षा देने से छात्रों में परीक्षा का सामना करने की शक्ति और क्षमता आती है। एक बार बोर्ड परीक्षा का अनुभव हो जने से बारहवीं की बोर्ड परीक्षा बिना घबराहट के सहजता से दे पाते हैं। यदि परिवार का साथ हो तो नकारात्मक बातें पीछे छूट जती हैं। पहले तो पांचवीं और आठवीं की भी बोर्ड की परीक्षाएं होती थी। कहीं-कहीं अभी भी होती हैं। मेरे विचार से तो दसवीं की बोर्ड परीक्षा होनी ही चाहिए।

इंदिरा सदावर्ती, नई दिल्ली

पहले पेट पूज है भाई

विधानसभा सत्र के दौरान पकवानों की खुश्बू ने इतना ललचाया कि नेतागण बीच में ही कार्यवाही छोड़कर उनका लुत्फ उठाने सदन से बाहर हो लिए। इसमें उन्होंने क्या गुनाह किया? हमारे बुजुर्ग तो कह गए हैं कि ‘पहले पेट पूज फिर काम दूज’ और वसे भी ‘जब पेट में पड़ा चारा तब कूदे बेचारा।’ हलवाई भी जब नया कारीगर रखता है तो पहले ही दिन उसको मिठाई खाने की छूट दे देता है, ताकि उसका मिठाइयों के प्रति मन भर जए और कामकाज में मन लगा रहे। पूरे दिन विधानसभा कार्यवाही और आधे घंटे पेट पूज, तो पहले छोटे कार्य से मुक्त कर लेनी चाहिए। क्या किसी ने पेट्रोल बिना गाड़ी को चलते देखा है?

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

ऐसी दलील मजबूरी है या..

हाल ही में एक टीवी न्यूज चैनल ने  दिखाया कि सब्जियां उगाने वाले खेतिहर सरेआम सब्जियों में जहर के इंजेक्शन लगा-लगाकर महज अपनी आमदनी बढ़ाने के चक्कर में लोगों के जीवन को संकट में डाल रहे हैं। किसान से पत्रकार ने पूछा कि जब आप यह जनते हैं कि यह टीका जहरीला है और इस पर रोक है, फिर आप ऐसा क्यों करते हैं? तो उस किसान ने धोती के पल्लू में अपना मुंह छिपा कर जवाब दिया कि इसमें हमें दुगुनी फसल मिलती है, जिसे बेचकर हम इस महंगाई के जमाने में अपने परिवार का पेट पालते हैं। अब इसमें किसी का नुकसान हो
(अर्थात किसी की जन चली जए) तो हम क्या कर सकते हैं? वाह! क्या दलील है!

श्याम सुन्दर शर्मा ‘साक्षी’, दिल्ली

यमुना की गंदगी

यमुना नदी हमारी जीवन-रेखा है। पर बेचारी यह नदी कई दशकों से हमारी मेहरबानी से गंदे नाले में तब्दील हो गई है। पिछले लगभग 8-10 साल से यमुना को साफ करने की कवायद जरी है। सरकारी बयानों के मुताबिक यमुना को साफ करने में अब तक करोड़ों रुपया बहाया जा चुका है, किन्तु हालात जस के तस ही हैं। पता नहीं ये करोड़ों रुपए कैसे और कहां खर्च हो गए? यदि इतनी बड़ी रकम लगा कर यमुना के समानान्तर एक नाला भी बना दिया जता तो अब तक 80 प्रतिशत यमुना तो वसे ही साफ हो गई होती।

इन्द्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

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