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मोर्चे ही मोर्चे

ाोड़-तोड़ की राजनीति में कोई पूर्ण विराम नहीं होता। मतदान में अभी काफी समय है इसलिए चुनावी मोचरे की जो सूरत इस समय हमारे सामने है, उसे अंतिम मानकर कोई विश्लेषण भी पेश नहीं किया जा सकता। चुनाव होने तक इसमें कई और उतार-चढ़ाव आ सकते हैं। चुनाव के बाद तो खर आने ही हैं। पर फिलहाल जिस तरह से तामिलनाडु की पार्टी पीएमके यूपीए गठाोड़ से अलग हुई है और जिस तरह से लालू, मुलायम और रामविलास ने एक नई खिचड़ी पकाई है, उसमें एक पैटर्न जरूर है। एक तो ये कि सार दल कभी न कभी यूपीए से जुड़े रहे हैं। मुलायम की समाजवादी पार्टी को छोड़ दें तो बाकी तीनों दल तो बाकायदा केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हैं। चारों दलों की यूपीए या कांग्रेस से कोई तत्काल शिकायत भी नहीं है। पीएमके को शिकायत है भी तो यूपीए से नहीं द्रमुक से है। खुद द्रमुक ने ही पीएमके का साथ छोड़ने की घोषणा की थी। और इस पार्टी को यह भी लग रहा है कि राज्य में हवा फिलहाल अन्नद्रमुक की तरफ बह रही है, इसलिए उसी तरफ का रुख करने में ही भलाई है। अगर पीएमके का सारा ध्यान प्रादेशिक समीकरण पर है तो लालू, मुलायम और रामविलास का समीकरण भी दिल्ली को नहीं छूता। वह गाजियाबाद से शुरू होकर बिहार के रास्ते झारखंड तक ही जाता है, बस। ये तीनों यूपीए के साथ रहते हुए अपना समीकरण बना रहे हैं। एक तरह से यह यूपीए के मोर्चे के भीतर का ही एक मोर्चा है। सीमित भूगोल के ये नए मोर्चे ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने की जुगत से ज्यादा कुछ नहीं हैं। चुनाव बाद की राजनीति में अपनी हैसियत बढ़ाने का इन दलों को फिलहाल यही सबसे अच्छा तरीका लग रहा है। कुछ समय पहले कुछ ऐसा ही सुलूक बीजू जनता दल ने एनडीए से अलग होकर किया था। लगातार बनते बिगड़ते ये मोर्चे एक और भी कहानी कह रहे हैं। जब हम राजनीति के ध्रुवीकरण की बात करते हैं तो यह मानते हैं कि दो या तीन राष्ट्रीय दलों के आस-पास छोटे और क्षेत्रीय दलों का हुाूम जमा होगा और नए समीकरण सामने आएंगे। पर ऐसा नहीं हो रहा। लगता इन छोटे दलों को क्षेत्रीय समीकरणों के लिए राष्ट्रीय दलों की बहुत जरूरत नहीं रह गई है। इन छोटे दलों के प्रभाव का भूगोल सीमित हो सकता है लेकिन खुद को अखिलभारतीय कहने वालों के असर का भूगोल भी बहुत विशद और विस्तृत नहीं रहा गया है।

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