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अहं और आत्मा

मैं एक सड़क से गुजर रहा हूं। अचानक मेरी गाड़ी के आगे एक ओपन वैन आ जाती है। उसमें एक पार्थिव देह है। मन ही मन अंतिम यात्रा करने वाले शख्स को प्रणाम करता हूं। लेकिन उसके बाद मैं सहा नहीं रह पाता हूं। मैं किसी तरह उस गाड़ी से आगे निकल जाना चाहता हूं। साथ बैठी मेरी पत्नी कहती हैं कि मरने के बाद किस तरह एक-एक मिनट भारी पड़ता है। मैं गमगीन सा हो जाता हूं। कुछ कहना चाहता हूं। लेकिन सही शब्द नहीं मिल पाते। असल में जब हम किसीका अंतिम संस्कार करते हैं, तो उसकी पार्थिव देह का ही तो करते हैं न। हमें जल्दी भी शरीर को मिटाने की होती है। उसके आत्म तत्व को मिटाने की नहीं। हमें जो दिखता है, वह शरीर ही होता है। एक मायने में हम शरीर को अहम मानते हैं। हम शरीर जरूर हैं। लेकिन महा शरीर नहीं हैं। हम उससे कहीं ऊपर हैं। यह एहसास हमें रहता है। एक होता है अहम और दूसरा आत्म या आत्मा। अहम को अहंकार से जोड़ा जाता है। शायद इसीलिए अपने यहां तो जीते जी शरीर को जलाने की बात की जाती है। कहते हैं न कि अपने अहम को मिटा दो। अहंकार को जला दो। उस अहम को मार बगैर हम शरीर से आगे नहीं जा सकते। हम लगातार शरीर से ऊपर होने की कोशिश करते रहते हैं। शरीर होता है स्थूल और आत्मा होती है सूक्ष्म। विकसित होने का मतलब ही स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा होता है। स्थूल की यात्रा हमेशा बाहर-बाहर होती है। सूक्ष्म की यात्रा भीतर होती है। अहम हमारी बाहरी पहचान है। इसीलिए वह शरीर है। आत्म हमारी भीतरी पहचान है। इसीलिए वह चैतन्य है। जब हम किसीकी अंतिम यात्रा पर जाते हैं, तो उसकी भीतरी पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं करते। हम तो बाहरी पहचान को मिटाने के लिए जाते हैं। उसके अहम को खत्म कर आते हैं। आत्म को हम खत्म नहीं कर सकते। वह ब्रह्मांडीय चेतना का हिस्सा होता है। शायद इसीलिए अपना दर्शन शरीर से ऊपर होने की बात करता है। आखिरकार जो मरता है वह अहम होता है, आत्म नहीं।

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  • Web Title: अहं और आत्मा