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अच्छी पत्नी बनाम अच्छी औरत

अच्छी पत्नी बनाम अच्छी औरत

वह एक अच्छी पत्नी है। शादी के समय के सात फेरों के सात वचन उसे निभाने हैं। हर हाल में पति का साथ देने वाला वचन तो सबसे पहले। पति सही हो या गलत.. यूं अक्सर वह गलत नहीं होता! भारतीय विवाह की शुभ परंपरा यही कहती है। पत्नी को बारामासी फूल जैसा होना चाहिए, जो हर मौसम की मार सहे, पर फिर भी उसी शिद्दत से खिले। फिलहाल अनुपम आहूजा ऐसी ही पत्नी बनी हुई हैं। उनसे पहले देवेंदर कौर भी यह मिसाल रख चुकी हैं। अपराध की दुनिया में ऐसे कितने ही नाम हैं, जिनकी पत्नियों ने अपना यह धर्म निभाया है। कितनों ने अपराध के गर्त में गिरने में पतियों की मदद भी की है। फिर भी तमाम सबूतों को झुठलाया है। पति को मासूम और पीडि़त को फरेबी बताया है। परिचित उन्हें ‘गुड वाइफ’ कहते हैं लेकिन इनसानियत.?

‘इनसानियत उन्हें बुरी औरत ही कहेगी, भले लोग उन्हें अच्छी पत्नी कहें।’ एक बार एक प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने कहा था, ‘हालांकि जब मामला अदालत में हो, और उस पर फैसला बाकी हो, किसी भी व्यक्ति को मुजरिम घोषित नहीं किया जा सकता। न ही उसके खिलाफ किसी अपराध को साबित किया जा सकता है, लेकिन फिर भी अक्सर पत्नियां मामले के शुरू होने से पहले ही पति को मासूम कह देती हैं। अक्सर मासूम न होने के बावजूद उनके साथ खड़ी रहती हैं। क्या आप ऐसी स्त्रियों को अच्छी औरत भी कह सकते हैं?’

फिलहाल  परंपराप्रेमियों के लिए सिने स्टार शाइनी आहूजा की पत्नी अनुपम एक अच्छी पत्नी होने का लगातार सुबूत दे रही हैं। शाइनी अपने घर की नौकरानी से बलात्कार के मामले में फंसे हुए हैं। पुलिसिया सबूत उनके खिलाफ हैं, लेकिन अनुपम को उन पर पूरा भरोसा है। पति पर अपने भरोसे को वह एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिए साबित भी कर चुकी हैं। मीडिया से भी बातचीत कर रही हैं। जब एक संवाददाता ने उनसे कहा कि अगर शाइनी सचमुच गिल्टी हुए तो.. तो उसकी बात सुने बिना ही उन्होंने आस्था जताई, ‘मेरा पति कोई गलत काम नहीं कर सकता। न वह सिगरेट पीता है, न शराब।’

‘आस्था पर कोई तर्क नहीं किया जा सकता।’ समाजशास्त्री डॉ. संपिका महापात्रा कहती हैं, ‘भरोसा तो टूट सकता है, लेकिन आस्था नहीं। हमारे समाज में पति पर आस्था की जाती है। परंपराएं और धर्म, तर्क का नहीं, आस्था का मसला होते हैं। आप उन पर सवाल खड़ा ही नहीं कर सकते। तमाम धार्मिक कृत्य और रूढिम्यों का पालन करते हुए आप आस्था की दुहाई देते हैं और बच जाते हैं।’ बेशक, अनुपम आहूजा भी उसी आस्था से बंधी हुई लगती हैं।

मेरा पति वेश्या के पास जाए, आपको क्या?
अनुपम से पहले पति पर यही आस्था देवेंदर कौर भी दिखा चुकी हैं। उस पति पर, जिसकी पियक्कड़ी के चलते वह उससे सालों पहले दूरी बना चुकी थीं। लेकिन देवेंदर ने निठारी कांड के बाद पति मोनिन्दर सिंह पंधेर का पूरा साथ दिया। वह बराबर कहती रहीं कि उनके पति बेकसूर हैं। बाद में उन्होंने यहां तक कह डाला कि अगर अदालत उन्हें वेश्याओं के पास जाने का कसूरवार ठहरा रही है तो पहले उसे वेश्यावृत्ति पर रोक लगानी चाहिए। इसके अलावा अगर मोनिंदर वेश्याओं के पास जाते भी हैं तो इससे किसी को क्या शिकायत है?
अक्सर बलात्कार और हत्या के आरोपियों के परिवारजन उस पर ऐसी ही हैरत में डालने वाली आस्था रखते हैं। यह कहते हुए कि भली-बुरी स्थिति में परिवार वाले ही साथ देते हैं। कई बार तो जुल्म साबित होने के बाद भी वे उसके पक्ष में मजबूती से खड़े रहते हैं। मोनिंदर सिंह पंधेर के मामले में भी ऐसा ही हुआ। यहां तक कि आरुषि हत्याकांड में भी जब शुरुआती दौर में शक की सूई आरुषि के पिता डॉक्टर तलवार पर उठ रही थी तो उनकी पत्नी ने पति का ही साथ दिया। बेशक यह मामला थोड़ा अलग मिजाज का था, लेकिन इसने भी इस बात को ही बल दिया कि महिलाएं अक्सर पति के खिलाफ खड़ी होने से डरती हैं या परंपरागत सोच उन्हें पति के खिलाफ खड़ा होने की इजाजत ही नहीं देती। ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन्स एसोसिएशन की महासचिव सुधा सुंदररामन कहती हैं,  ‘जब पत्नी, अच्छी औरत की बजाय एक अच्छी बीवी ही बनी रहना चाहेगी तो समाज कहां जाएगा? तब आप स्त्री स्वांतत्र्य की बात कैसे करेंगे? स्त्री स्वांतत्र्य की छोडि़ए- मनुष्य की आजादी की बात कैसे करेंगे?’

वह चींटी भी नहीं मार सकता
‘आप बेवफाई की बात कैसे कर सकती हैं? शाइनी ने कुछ किया ही नहीं तो.. ’शाइनी के एक पड़ोसी सतीश कपूर ने एक संवाददाता से बातचीत में कहा था, ‘जब कुछ साबित होगा, तब आप अनुपम की प्रतिक्रिया पर सवाल उठा सकती हैं। फिलहाल कुछ साबित नहीं हुआ है।’ बेशक कुछ साबित नहीं हुआ है, लेकिन अनुपम ने एक बार भी यह नहीं कहा कि अगर शाइनी अपराधी हुए तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए। वह तो विश्वास की बात कर रही हैं और उस नौकरानी को ही चरित्रहीन बता रही हैं।’ निर्देशक मधुर भंडारकर पर एक मामले में आरोप लगा चुकी मॉडल और अभिनेत्री प्रीति जैन कहती हैं। शाइनी के खिलाफ मोर्चा निकालने के सिलसिले में प्रीति को गिरफ्तार भी किया गया था।
मशहूर वकील अंजलि सिन्हा कहती हैं, अक्सर ऐसे मामलों में पीडि़त को ही चरित्रहीन बता दिया जाता है। इससे अपराधी को बल मिलता है। बात पत्नी या परिवार जन की नहीं, बात यह है कि बलात्कार जैसे मामलों में पीडि़त को दोषी बताकर हम किस समाज का आधार रख रहे हैं? अनुपम तो उससे भी आगे चली गईं। उन्होंने तो पीडि़त को ही बलात्कार का आरोपी बता दिया, जबकि कानून भी महिला द्वारा बलात्कार को मान्यता नहीं देता।

कम से कम पत्नी को यह तो कहना चाहिए कि दोषी होने पर उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए। गोवा का एक मामला अब भी ताजा है। वहां के एक ऑटो ड्राइवर महानंद पर आठ महिलाओं की हत्या का आरोप लगा। उनमें से एक के साथ उसने बलात्कार भी किया था। वह महिला उसकी पत्नी पूजा की सहेली थी। बाद में पूजा पर भी अपने पति का साथ देने का आरोप लगा। पूजा ने खुद को और महानंद को बेकसूर बताया। उसने कहा- मेरा पति चींटी भी नहीं मार सकता। इसके बावजूद पूजा ने यह स्वीकार किया कि अगर उसके पति पर आरोप साबित हो जाएं तो उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए।

एक अच्छी पत्नी या एक अच्छी औरत
क्या ये सभी अच्छी पत्नियां हैं? अशोक जडेजा के साथ मिलकर देश भर में करोड़ों की ठगी करने वाली नीतू भी और अहमदाबाद में पति हीरेन परमार और 16 साल की एक मॉडल की ब्ल्यू फिल्म बनाने वाली पत्नी गीता परमार भी। एक अच्छी पत्नी होना क्या है? महिला अधिकारों की हिमायती मधु किश्वर कहती हैं, ‘एक अच्छा इनसान हुए बिना, एक अच्छी पत्नी नहीं बना जा सकता। पति या पत्नी होने से पहले हम सब एक मनुष्य हैं और इसके भी अपने फर्ज हैं। हमें उस फर्ज का भी ध्यान रखना चाहिए। यह विडंबना ही है कि अक्सर एक अच्छा इनसान बनने पर औरत एक अच्छी पत्नी नहीं रह जाती। पति के गलत कृत्यों में उसे, उसका साथ देना पड़ता है या उसकी अच्छी छवि समाज के सामने रखनी पड़ती है। अगर वह उसका विरोध करती है, उससे अलग हो जाती है तो समाज में उसे बुरी पत्नी घोषित कर दिया जाता है।’

इस आधार पर अनुपम आहूजा एक अच्छी पत्नी हैं। वह दुनिया के सामने बॉलीवुड स्टार अपने पति की वह इमेज बनाना चाहती हैं, जो बॉलीवुड के लिए तो कतई मायने नहीं रखती। र्दुव्यवहार बॉलीवुड में कोई नई बात नहीं। यौन शोषण भी। तमाम बड़े निर्माता-निर्देशकों पर यह आरोप लगते रहे हैं। यह अलग बात है कि खुलकर कोई कुछ नहीं कहता। प्रीति जैन जैसे मामले भी तब खुलते हैं, जब मधुर भंडारकर जैसा फिल्मकार उन्हें किया गया वादा नहीं निभाता। अगर निभाता तो यह मामला भी शायद दब जाता। बात फिर अच्छी पत्नी बनाम अच्छी औरत की। अक्सर पत्नियों को ही अच्छी पत्नी होने प्रमाण देना पडम्ता है। तब अनुपम जैसी औरतें प्रेस कांफ्रेंस करके, अग्नि परीक्षा देती हैं। क्या पतियों को भी कभी खुद को अच्छा पति साबित करना पड़ता है? अक्सर बलात्कार की शिकार पत्नियों पर मामला दबाने का दबाव डाला जाता है। हां, औरतें अच्छी पत्नी बनते-बनते, कई बार अच्छी नागरिक नहीं रह जातीं।


दि अदर साइड
विदेशों में भी ‘अच्छी पत्नियों’ की कोई कमी नहीं है। कई राष्ट्राध्यक्षों की पत्नियों के सामने जब यह मौका आता है कि वे खुद को अच्छी स्त्री या पत्नी साबित करने में से किसी एक को चुनें तो अक्सर वे अच्छी पत्नी होना ही बनना पसंद करती हैं। लगभग एक दशक पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन एक ऐसे स्कैंडल में फंसे थे, जिसने न केवल अमेरिका के राष्ट्रपति पद की गरिमा को कम किया, बल्कि बिल क्िलंटन को भी पूरी दुनिया के सामने शर्मसार कर दिया था। बिल क्लिंटन पर अपने ही कार्यालय में एक इंटर्न के रूप में काम करने वाली मोनिका लेविंस्की के साथ ‘ओरल सेक्स’ करने के आरोप थे, जो बाद में सही साबित हुए थे। उस समय मोनिका की उम्र महज 22 वर्ष थी। दुनिया में सुपर पावर की छवि रखने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने न केवल मोनिका के साथ अपने रिश्तों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था, बल्कि पूरे देश से इस मामले में माफी भी मांगी थी। दिलचस्प बात है कि इस पूरे प्रसंग में जब पूरी दुनिया बिल क्लिंटन को हेय दृष्टि से देख रही थी, तब उनकी पत्नी हिलेरी ने एक ‘आदर्श’ पत्नी की भूमिका निभाते हुए अपने पति का ही साथ देना मुनासिब समझा था। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी का मामला थोड़ा सा अलग है। सरकोजी की पहली पत्नी ने उनसे इसलिए तलाक ले लिया था, क्योंकि सरकोजी के कई महिलाओं से रिश्ते थे। दुनिया में तमाम ऐसे मामले देखने में आते हैं, जिनमें अमूमन पत्नियां अपने पति के इस तरह के कथित अपराधों को निजी स्तर पर माफ कर देती हैं और अपने पति का ही पक्ष लेती हैं। मजे की बात यह है कि भारत के मुकाबले आधुनिक मूल्यों के पक्षधर यूरोपियन समाज में भी महिलाएं अच्छी स्त्री होने के बजाय अच्छी पत्नी होने को ही प्राथमिकता देती हैं।  

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