प्रणव को पड़ेगी विनिवेश की जरूरतः विशेषज्ञ - प्रणव को पड़ेगी विनिवेश की जरूरतः विशेषज्ञ DA Image
18 फरवरी, 2020|6:35|IST

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प्रणव को पड़ेगी विनिवेश की जरूरतः विशेषज्ञ

प्रणव को पड़ेगी विनिवेश की जरूरतः विशेषज्ञ

अर्थशास्त्रियों की राय में इस सप्ताह पेश किए जाने वाले बजट में सरकार के सामने उद्योगों को नरमी से उबारने और सरकारी खजाने पर घाटे के बढ़ते बोझ को कम करने की दोहरी चुनौती है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस समय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के पास खर्च कम करने या आय बढ़ाने की गुंजइश कम है। ऐसे में उनको छह जुलाई को पेश किए जने वाले 2009-10 के पूर्ण बजट में विनिवेश और लाइसेंस शुल्क जसे गैऱ कर राजस्व का सहारा लेना पड़ सकता है।

दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित आर्थिक अध्ययन संस्था, नेशनल कौंसिल फार एप्लाइड इकोनामिक रिसर्च (एनसीएईआर) के वरिष्ठ फेलो शशांक भिडे ने कहा कि सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती वद्धि दर को पटरी पर लाना और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना है। वद्धि दर को गति देने के लिये बजट में सरकार का पूरा ध्यान बुनियादी ढांचे के निर्माण और उत्पादक निवेश में वद्धि कर अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ावा देने पर होगा। उनकी राय में सरकार आवासीय परियोजनाओं और बुनियादी ढांचा में निवेश पर कर छूट बढ़ा सकती है और नए निवेश बांड जारी कर सकती है।

वैश्विक बाजरों में मंदी के प्रभावों के बीच भारत की आर्थिक वद्धि 2008.09 में गिर कर 6.7 प्रतिशत रह गयी जबकि 2007-08 में यह 9 प्रतिशत और 2006-07 में 9-6 प्रतिशत थी। भिडे ने कहा कि सरकार के पास व्यय में कटौती और राजस्व में बढ़ोतरी की गुंजाइश बेहद कम है। ऐसे में घाटे की भरपाई के लिये सरकार विनिवेश, स्पेक्ट्रम की नीलामी से जुड़े लाइसेंस शुल्क जसे गैर कर राजस्व का सहारा ले सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के विनिवेश के मामले में कुछ बड़े फैसले ले सकती है।

उल्लेखनीय है कि एनएचपीसी और आयल इंडिया लि़ ने प्रथम सार्वजनिक निर्गम के लिए पिछले वर्ष ही सेबी की अनुमति हासिल कर रखी है। इसी तरह एनटीपीसी ने भी एक और सार्वजनिक निर्गम के लिये बाजर नियामक से मंजूरी हासिल कर रखा है। पर शेयर बाजार की हालत खराब होने से उन्होंने आईपीओ का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

रिसर्च एंड इनफार्मेशन सिस्टम (आरआईएस) फार डेवलपिंग कंट्री के वरिष्ठ फेलो डा़ सचिन चतुर्वेदी ने भी कहा कि बजट में सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे पर सरकार का पूरा जोर होगा। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य जसे सामाजिक क्षेत्रों में सरकार विशेष जोर देगी और इस मद में व्यय बढ़ने की पूरी संभावना है।

चतुर्वेदी ने कहा कि राजकोषीय घाटे का बढ़ना जरूर चिंता की बात है लेकिन वैश्विक स्तर पर जारी मंदी के बीच सरकार का जोर इस समय घरेलू अर्थव्यवस्था में मांग तथा लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाने पर होगा। ऐसे में वह नरेगा जैसे रोजगार कार्यक्रम और बुनियादी ढांचा में निवेश बढ़ाने पर जोर देगी।

गौरतलब है कि इस वर्ष फरवरी में पेश अंतरिम बजट में राजकोषीय घाटे को 5.5 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया था। फिलहाल राजकोषीय घाटा 6.2 फीसद हो गया है। पहले यह लक्ष्य 2.5 रखा गया था।

देश के शीर्ष उद्योग मंडलों के लिये काम कर चुके वरिष्ठ अर्थशास्त्री तुषार भट्टाचार्य ने कहा कि सरकार वश्विक स्तर पर जरी मंदी के बीच पेश इस बजट में सामाजिक, आर्थिक विकास और कषि क्षेत्र को ज्यादा तवज्जो दे सकती है। उन्होंने कहा कि विकसित देशों में जारी मंदी के कारण निर्यात में कमी की आशंका बनी हुई है। ऐसे में सरकार अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों को निर्यात बढ़ाने के लिये कुछ उपायों की घोषणा कर सकती है।

भिडे ने कहा कि निर्यात में नरमी बने रहने के बीच सरकार उद्योगों को वश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिये कदम उठा सकती है। साथ ही ऐसे उद्योगों को कुछ राहत दी ज सकती है जो मंदी के कारण सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं।

करों के संबंध में भिडे ने कहा कि कर में छूट की संभावना बेहद सीमित है। उन्होंने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) इस बजट में लाये जाने की संभावना सीमित है। वर्ष 2010 में इसे लागू किये जाने के मददेनजर उत्पाद शुल्क और सेवा कर के ढांचे में कुछ रद्दोबदल किया जा सकता है। इसी क्रम में सेवा कर की दरों में हल्की बढ़ोतरी की जा सकती है। फिलहाल सेवा कर 10 फीसद है। बहरहाल, चतुर्वेदी और भट्टाचार्य का मानना है कि सेवा कर में बढ़ोतरी की गुंजइश बेहद कम है।

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