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किसानों के घर लगी आग तो दलालों के जागे भाग्य

किसानों के घर लगी आग तो दलालों के जागे भाग्य। प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगाने वाले उन फर्जी किसानों की जेब में चली गई डीजल सब्सिडी की राशि जिनकी रोटी मुखिया जी के आगे-पीछे करने से चलती है। जो साहब के लिए जीते-मरते हैं। असली किसानों के तो जूते घिस गये मुखिया के दरवाजे का चक्कर काटते-काटते।

अब तो साल बीत गया और आप जनना चाहते हैं दर्द। तो यही जान लीजिए कि महाजन से लिया गया उधार सूद के साथ बढ़कर ड्योढा़ हो गया है। अब हिम्मत नहीं कि सरकार की नई घोषणा की बदौलत इस साल हम उधार लेकर डीजल खरीदें। सरकार अगर रहम करना चाहती है तो बस इतना कर दे कि पिछली राशि हमें दिला दे। वर्ना छोड़ दे हमें अपनी किस्मत पर मरने-जीने को।

सरकारी घोषणा के अनुसार पिछले वर्ष डीजल पर अनुदान पाने में हुई परेशानी को जब हिन्दुस्तान ने किसानों के साथ शेयर किया तो उनके दिल से जो बातें निकलीं उसका लब्बोलुआब यही है। किसानों ने दो टूक कहा कि इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में सरकार बदलाव करे तो सही मायने में उन्हें कुछ लाभ हो सकता है वरना फिर दलालों और बिचौलियों की ही पौ बारह होगी।

गोपालगंज से पटना पहुंचे बलिराम प्रसाद राय का कहना है कि खेती का समय बीतने के बाद ही सही लेकिन उन्हें सब्सिडी मिल गई। पर गांव के कई किसान इससे वंचित रह गये। फर्जीवाड़ा करने वालों ने उड़ा लिए पैसे और मुंह ताकते रह गये वाजीब हकदार। पुनपुन के ललन प्रसाद सिंह कहते हैं कि कई उनके परिचित ऐसे भी हैं जिन्होंने डीजल के पुर्जे को अनुदन के लिए तय राशि के 25 प्रतिशत पर बेच दिया।

दलालों ने यह कहकर उनसे पुर्जे ले लिया कि सरकारी पैसा इतनी आसानी से नहीं मिलता। बेचारा मरता, क्या नहीं करता! उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि कर्मचारी के पास रिकार्ड लेकर रकबा के हिसाब से राशि सीधे किसानों के खाते में डाल दे। जहानाबाद के दाउदपुर निवासी शेषनाथ को आज तक पैसा नहीं मिला है।

किनारी पंचायत में उनका गांव पड़ता है। वहां के मुखिया के पास 18 एकड़ खेत की सिंचाई के लिए दावा किया था। खरीदे गये डीजल का पुर्जे भी दिया था लेकिन अब तो मुखिया जी फोन करने पर मोबाइल भी नहीं उठाते हैं।

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