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सहयोगियों के हटने से कांग्रेस संकट में

लोकसभा चुनावों के नजदीक आन के साथ कांग्रेस नीत संप्रग उसी तरह की समस्या का सामना करता प्रतीत हो रहा है जैसा भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को 2004 में करना पड़ा था।ड्ढr पीएमके के साथ छोड़ने और राजद तथा लोजपा के सपा के साथ मिलकर बिहार और यूपी में धर्मनिरपेक्ष गठबंधन बनाए जान के साथ संप्रग व कांग्रेस का एकता सूचकांक तेजी से गिरा है। पीएमके सबसे ताजा घटक है जिसन केंद्र के कांग्रेस नीत गठबंधन का साथ छोड़ा है। इससे पहले एमडीएमके, टीआरएस और पीडीपी से हाथ छूट चुका है। वर्ष 2004 में चुनावों के मौके पर राजग को अपने आधा दर्जन सहयोगियों से हाथ धोना पड़ा था। इसके साथ ही पिछले चुनाव से पहल कांग्रेस अध्यक्ष धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक मंच पर लाने में कामयाब हुई थीं। राजग का खेमा छोड़ने वालों में प्रथम लोजपा थी जिसने गोधरा और उसके बाद की हिंसा के बाद 2002 में रास्ता बदल लिया था। भगवा शक्ितयों का साथ उन चुनावों से पहले जिन अन्य ने छोड़ा था उनमें पीएमके, एमडीएमके, द्रमुक, इनेलोद और रालोद शामिल थे। इनमें तमिलनाडु में पीएमके, एमडीएमके और द्रमुक संप्रग का हिस्सा बन गए जबकि पासवान पहले ही कांग्रेस के साथ साझा एजेंडा बना चुके थे। संप्रग को सबसे बड़ा झटका उस समय लगा जब चार साल से समर्थन दे रहे वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया।ड्ढr ड्ढr इसी के साथ मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने संकट के समय विश्वास मत की नैया पार लगाने में मनमोहन सिंह सरकार की मदद की और उनके समर्थन में मतदान किया।विपक्ष ने हालांकि आरोप लगाया कि यह विश्वासमत धनशक्ित के बल पर जीता गया। राष्ट्रपति चुनाव में संप्रग का समर्थन करने वाली मायावती की बसपा भी 22 जुलाई को हुए विश्वासमत के दौरान सरकार के विरोध में खड़ी थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हालांकि राजद और लोजपा द्वारा कांग्रेस को बिहार में अकेला छोड़ देने के बाद उन सुझावों को खारिज किया कि यह संप्रग का अंत है। कांग्रेस अब बिहार में अपने दम पर राज्य की 40 सीटों में ज्यादातर पर लड़ रही है।

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