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22 फरवरी, 2020|4:12|IST

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हरित प्रौद्योगिकी के जरिए हरे डीजल की संभावना

उत्प्रेरक की मदद से शैवाल तथा अन्य बायोमास को तरल ईंधन में परिवर्तित करने की नयी प्रक्रिया ने देश में वैकल्पिक ईंधन उत्पादन की संभावनाओं के प्रति उम्मीद जताई है। सस्टेनेबल टेक्नोलोजीज एंड एनवायरनमेंटल प्रोजेक्टस (एसटीईपीएस) के निदेशक टी रावेन्द्र राव ने बताया यह प्रौद्योगिकी शैवाल तथा अन्य बायोमास को पेट्रोलियम डीजल से मिलते जुलते तरल ईंधन में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। यह तरल ईंधन अपनी गुणवत्ता में बायोडीजल से बेहतर होगा। यह प्रौद्योगिकी एक पायरो  कैटालिसिस प्रक्रिया है।
   
उन्होंने प्रेस ट्रस्ट को बताया मूलत: हाइड्रोकार्बन तेल शैवाल से ही बनते हैं लेकिन इनके निर्माण में लाखों बरस लगते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी की सतहों के अंदर चलती है। अब, हम इस प्राकृतिक प्रक्रिया को उत्प्रेरक प्रक्रिया का इस्तेमाल कर कम समय में दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। इस नवोन्मेशी प्रयोग को हाल ही में इनोवेटर्स अवार्ड के स्वर्ण पदक से नवाजा गया। यह अवार्ड एअरोस्पेस क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लाकहीड मार्टिन कारपोरेशन अपने इंडिया इनोवेशन ग्रोथ प्रोग्राम के तहत देती है।

राव के अनुसार, नयी प्रक्रिया से अधिक ईंधन मिल सकता है। इस प्रक्रिया में शैवाल का एक खास तापमान पर वाष्पीकरण किया जाता है और फिर उसे एक उत्प्रेरक परिवर्तन कक्ष से गुजरा जाता है। अब शैवाल एक आणविक रूप में बदल जाती है जो हाइड्रोकार्बन ईंधन के अणुओं से मिलता जुलता होता है। संपीड़ित कर इस वाष्प को तरल ईंधन में बदल दिया जाता है। इसके बाद यह तरल ईंधन एक आसवित कक्ष यानी डिस्टिलेशन कालम में भेजा जाता है। आसवन की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद हल्के ईंधन को अलग कर लिया जाता है।
   
राव ने बताया तरल ईंधन हल्के और मध्य आसवित स्तरीय तेल का मिश्रण होता है। यह पूरी तरह हाइड्रोकार्बन ईंधन जैसा होता है अत: इसमें अब और किसी प्रक्रिया की या अन्य मिÞश्रण मिलाने की जरूरत नहीं होती। इस ईंधन को सीधे इंजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि पूर्व में कुछ भारतीय संस्थानों ने बायो ईंधन का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई थी लेकिन आगे कदम किसी ने भी नहीं बढ़ाया।

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