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युद्ध खत्म, श्रीलंका को चाहिए शांति

यह 2001 का शरद था। मैंने कई हफ्ते स्विट्जरलैंड में घूमते हुए बिताए, साथ ही वहां के श्रीलंकाई तमिलों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। कुछ ऐसे निर्वासित लोग थे, जो लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम के बारे में पक्के तौर पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। कुछ इसके खिलाफ भी थे। लेकिन मैंने पाया कि वहां रहने वाले 50,000 तमिलों में ज्यादातर ऐसे हैं, जो इस संगठन के कट्टर समर्थक हैं। वे सभी मानते थे कि श्रीलंका के तमिलों के पक्ष में अगर कोई वाकई खड़ा है तो वह प्रभाकरण और उसके लोग ही हैं।

इन्हीं दिलचस्प लोगों में एक थे मथियालकन। ‘मथी’ नाम से मशहूर ये शख्स वहां तमिलों के लिए एक सालाना खेल महोत्सव भी आयोजित करते हैं। जिसमें पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका से हजारों तमिल फुटबॉलर, क्रिकेट खिलाड़ी, एथलीट और पहलवान भाग लेते हैं। आयोजन के दो ही मकसद होते हैं, एक तो विदेश में बसे तमिलों को आपस में जोड़ना और दूसरे तमिल टाइगर्स के लिए पैसे जमा करना।

मैं इस खेल में शामिल हुआ और इसकी भावना को अच्छी तरह महसूस किया। जाफना में मथी एक प्रतिभाशाली छात्र थे, और एक अच्छे फुटबॉलर भी। वे चार्टड एकाउंटेंट बनना चाहते थे, लेकिन गृहयुद्ध ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अब वे एक रेस्तरां में शेफ हैं और अपना बाकी समय तमिलों की सेवा में बिताते हैं।

मैंने मथी से उसके घर पर तीन घंटे तक बात की। मेरा जन्म तमिल परिवार में हुआ था लेकिन मैं इस भाषा के कुछ सौ शब्द ही जानता हूं और मथी को बहुत कम ही अंग्रेजी आती है। इसलिए हमने ज्यूरिख में पढ़ने वाली एक जापानी लड़की को दुभाषिया बनाया। उसने मथी की स्विश जर्मन को और मेरी अंग्रेजी का एक दूसरे के लिए अनुवाद किया। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में दो तमिल मिल रहे थे, एक अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ और दूसरा विदेश में रहने को मजबूर। दोनों यूरोपीय भाषाओं में एक जापानी दुभाषिये की मदद से आपस में संवाद कर रहे थे।

मथी तमिल होमलैंड के लिए पूरी तरह से समर्पित था। उसका कहना था, ‘पांच सौ साल पहले हम तमिलों का अपना देश था, अपनी सरकार थी, अपना राज्य था। यूरोपीय उपनिवेशवाद और सिंहली अत्याचार ने इसे तबाह कर दिया। अब हम उसी जमीन को हासिल करने के लिए लड़ रहे हैं। हमें ईलम में जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। वही हमारा घर होगा, स्विट्जरलैंड नहीं हो सकता। यहां पर हम विदेशी ही रहेंगे।’

उसे उम्मीद थी कि एक दिन यह ईलम बनेगा। अपने लिए उसकी महत्वाकांक्षा सीमित थी। वह स्विश फुटबॉल लीग के लिए एक तमिल टीम बनाना चाहता था। यह टीम एक तरह का बीमा भी थी जो श्रीलंका में तमिलों की हार पर काम आती। मथी का कहना था,‘अगर श्रीलंका में एक भी तमिल नहीं बचा, तो भी वे यहां रहेंगे, उनकी संस्कृति यहां मौजूद रहेगी।’

अब जब श्रीलंका में युद्ध खत्म हो गया है तो मथी जैसे लोगों की भावनाओं का क्या होगा? आजद ईलम का उनका सपना एक रक्तरंजित दु:स्वप्न बनकर रह गया है। श्रीलंकाई तमिलों के विश्वास में खोट हो सकती है, लेकिन उन्होंने जो कुर्बानी दी है उसे पूरा सम्मान दिया जना चाहिए। श्रीलंका की जंग काफी बर्बर रही है। तमिल टाइगर ने बहुत से बेगुनाह लोगों को मारा और युद्ध के सारे नियमों का उल्लंघन किया। बच्चों को फौज में भर्ती किया और नागरिकों को अपनी ढाल बनाया। जिस भी तमिल ने उनके तरीके पर सवाल उठाया उसे मार दिया गया। लेकिन श्रीलंका की सरकार और सेना ने भी अत्याचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने मानवाधिकारों का जो उल्लंघन किया वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उन्होंने गांवों और शहरों पर अंधाधुंध बमबारी की।

श्रीलंका की सरकार ने युद्ध तो जीत लिया लेकिन शांति को वह कैसे जीतेगी? यह सब शुरू कैसे हुआ था? 1950 के दशक में जब सिंहली को पूरी देश की अकेली सरकारी बनाने की कोशिश हुई तभी यह सब शुरू हुआ था। उसके बाद मामला और ज्यादा भड़का, जब बौद्ध धर्म को श्रीलंका द्वारा आधिकारिक धर्म घोषित कर दिया गया। तमिल इसलिए आहत हुए क्योंकि ज्यादातर तमिल या तो हिंदू थे, या मुसलमान, या ईसाई। यह सब उस सिंहल कट्टरतावाद का नतीजा था, जिसने 1981 में जाफना में ऐतिहासिक तमिल पुस्तकालय को जला दिया।

साठ और सत्तर के दशक में तमिल राजनीतिज्ञ अहिंसक तरीकों से इसका विरोध करते रहे। खुद को दूसरी श्रेणी का नागरिक बनाए जाने के खिलाफ उन्होंने संसदीय तरीके ही आजमाए। लेकिन जफना में पुस्तकालय जलाने की घटना के बाद नौजवान तमिलों का धैर्य जवाब दे गया। उन्हें लगने लगा कि हथियार उठाकर ही वे आजाद ईलम हासिल कर सकते हैं।

लेकिन यह सपना बिखर गया। उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी और हार गए। अब इस द्वीप की किस्मत पूरी तरह विजेता सिंहलियों के नजरिये पर निर्भर है। क्या वे यह महसूस करेंगे कि इस वैमनस्य को खड़ा करने में उनकी भी एक बड़ी भूमिका थी? या वे इस जीत को अपनी कट्टरपंथी नीतियों की कामयाबी मानेंगे?

लगता है कि महिंदा राजपक्षे की सरकार यह मान रही है कि टाइगर्स के खात्मे के बाद तमिल अब श्रीलंका के आज्ञाकारी और वफादार नागरिक बन जाएंगे। बहुत कुछ जीतने वाले की महानता पर निर्भर करेगा। अगर वे सिंहली को अकेली राजभाषा बनाने वाली घोषणा वापस ले लें तो बहुत कुछ बदल सकता हैं। इससे नागरिकों को भाषा और आस्था की आजदी मिल जएगी, दूसरे दज्रे के नागरिक वाली भावना भी खत्म होगी। युद्ध के बाद संघीय समाधान की बात भी चल रही है ताकि तमिल इलाकों को नीतियों और प्रशासन में ज्यादा स्वायत्ता दी जाए। लेकिन भाषा और धर्म की घोषणा को वापस लिया जाना ज्यादा जरूरी है। श्रीलंका में स्थायी शांति इसी से आएगी।

एकाउंटेंट से शेफ बन गए मेरे दोस्त मथी को भी पता है कि स्विटजरलैंड में तमिल विदेशी ही रहेंगे। लेकिन अपनी जन्मभूमि में वे दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। इस भेदभाव को जड़ से खत्म करना ही श्रीलंका में स्थायी शांति का एकमात्र रास्ता है। इसके लिए राजपक्षे सरकार को अतीत की इस गलती को सुधारने का साहस दिखाना ही होगा। उन्हें श्रीलंका के सभी नागरिकों को बराबरी के दर्जे पर रखना होगा चाहे उनकी जो भी भाषा हो, जो भी धर्म हो।

ramguha@ vsnl. com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं।

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