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कलम और कूची की धनी ममता

वामपंथी होने के बावजूद मैं उन माक्र्सवादियों से नफरत करती हूं, जिन्होंने नंदीग्राम नरसंहार को अंजाम दिया और अनेक महिलाओं की आबरू लूटी, सिंगूर में जिन्होंने बलात्कार के बाद तापसी मल्लिक की हत्या की। हम लोग राजनीति नहीं करते किंतु हम परिवर्तन चाहते हैं। बंगाल में गत वर्ष हुए पंचायत चुनाव में ही साबित हो गया कि राज्यवासी भी परिवर्तन चाहते हैं। इस परिवर्तन की सूत्रधार ममता बनर्जी हैं। ममता ने अन्याय के खिलाफ सतत संग्राम किया है। ममता जहां खड़ी होती हैं, वहीं रणक्षेत्र बन जाता है। जहां भी उत्पीड़न और अन्याय है, वहीं ममता है। माक्र्सवादियों ने यहां भी अत्याचार किए, वहां पीड़ितों के साथ कौन खड़ा हुआ? ममता। पीड़ित जन-गण आज भी अपने भरोसे का साथ किसी को मानता है, तो वह ममता हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कोई पीड़ित स्त्री ममता की गोद में सिर रखकर अपना दुखड़ा रो सकती है। आज भी वे साधारण साड़ी पहनती हैं। पैर में हवाई चप्पल। सादगीभरा रहन-सहन। अपने आचरण में ममता खांटी वामपंथी हैं। पैसों के मामले में पूरी तरह पारदर्शी। इस स्पृहा को हम ममता के कला-कर्म से भी लक्ष्य कर सकते हैं। अपने देश में राजनीति और साहित्य दोनों क्षेत्रों में सक्रिय लोगों की लंबी परंपरा रही है। उसी परंपरा की एक कड़ी ममता बनर्जी से भी जुड़ती है। ममता ने एक लेखक व चित्रकार के बतौर भी अपनी छवि बनाई है। उनकी अब तक इक्कीस किताबें बंगाल के सबसे प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह देज पब्लिशिंग से प्रकाशित हुई हैं जिनमें ‘मां’, ‘नागोल’, ‘जन्मायनी’, ‘सरनी’, ‘आज के घड़ा’, ‘शिशु साथी’ (सभी कविता संग्रह) और ‘उपलब्धि’, ‘मां माटी मानुष’, ‘पल्लवी’, ‘जनतार दरबार’, ‘एकांते’, ‘अनुभूति’, ‘अशुभ संकेत’, ‘मानविक’, ‘जागो बांग्ला’, ‘गणतंत्र लज्जा’, ‘अनशन केनो’, ‘स्लाटर ऑफ डेमोक्रेसी’ व ‘मदरलैंड’ (गद्य संग्रह) बेस्ट सेलर किताबें रही हैं। राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद ममता के भीतर का सृजक सतत क्रियाशील रहा है और उनके सृजन को आम पाठकों के अलावा वामपंथी विद्वानों की स्वीकृति भी मिली है। कवि सुभाष मुखोपाध्याय ने ममता को शक्ितशाली कवि करार दिया था। मुझे भी ममता की कुछ कविताएं प्रीतिकर लगती हैं। बतौर बानगी, उनकी ‘सफेद गुलाब’ शीर्षक कविता देखें जिसमें वे कहती हैं- ‘शांति-समाधि पर खिले एक सफेद गुलाबमिट जाए सारी ग्लानि और क्लांति की छाप।’ एक अन्य कविता में ममता मनुष्य और मनुष्य के बीच बढ़ती दूरी को पाटने की कामना करती हैं- ‘मुक्त नदी की अबाध गति सागर की तरफ जाती हैसागर खुले मन से देता है उसे राहआदमी क्या समुद्र की तरह नहीं हो सकता?मिलन-मुहाने पर आदमी-आदमी का मिलकर एक हो जाना।’ एक दूसरी कविता में ममता मृत्यु को ललकारती हैं- ‘मृत्यु कौन डरता है तुमसे? तुमको चुनौती देने का साहस नहीं है किसी में? इसीलिए तो कहती हूं सामने आओ।’ कवि और कविता से अनन्य प्रेम ही था कि सुभाष मुखोपाध्याय के बीमार पड़ने पर ममता ने अपने सार राजनीतिक कार्यक्रम रद्द कर दिए और उनके इलाज का बेहतर प्रबंध किया। सुभाष दा के निधन के बाद की अंतिम क्रिया भी ममता की देख-रख में हुई। एक जनवादी कवि और वामपंथी चिंतक के प्रति तब ममता ने जो श्रद्धांजलि दी थी, उसे कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। अपने कहानी संग्रह ‘पल्लवी’ को ममता ने सुभाष मुखोपाध्याय और कवि नीरन्द्र नाथ चक्रवर्ती को ही भेंट किया है। लेखन के अलावा ममता पेंटिंग भी करती हैं। दो साल पहले उनकी चित्रकृतियों की प्रदशर्नी कोलकाता में हुई और उनके पेंटिंग्स की बिक्री से जो राशि आई, वह नंदीग्राम के पीड़ितों को उन्होंने दान कर दी थी। ममता की बनाई दो सौ चित्रकृतियों की पहली प्रदर्शनी पांच साल पहले कोलकाता में ही हुई थी। ममता की चित्रकृतियां उनकी एक भिन्न छवि हमार सम्मुख प्रस्तुत करती हैं। जनता में ममता की छवि एक संग्रामी नेता के रूप में, प्रतिवाद की राजनीति की प्रतीक के रूप में है पर साहित्य और चित्रकृतियों में ममता का उग्र रूप गायब है। उनके चित्रों की थीम में कोमलता है, कई-कई फूल हैं, मां का मुख है, भिन्न भंगिमाओं में जगन्नाथ हैं, गणेश हैं, मयुर-नृत्य है। पेंटिंग में ममता ममतामयी हैं। उनके भीतर यदि मां की सरलता नहीं होती तो वे मां को, फूल को कैनवास पर नहीं उतार पातीं। ममता के चित्रों की पहली प्रदर्शनी का शीर्षक था- ‘ममता : ट्वेंटीफाइव आवर्स ए डे।’ सचमुच सार्वजनिक जीवन में भी वे एक दिन में पचीस घंटे की ममता हैं। पचीस घंटे की इसलिए कि उनके यहां कोई जा सकता है। सबके लिए दरवाजे वे खुले रखती हैं। गांधी से कोई भी मिल सकता था, गांधी की परंपरा को ममता ने जीवित रखा है। गांधी से वे आज भी प्रेरणा लेती हैं। गांधी की तरह ममता भी अनशन करने का माद्दा रखती हैं। अहिंसक सत्याग्रह का माद्दा रखती हैं। और यह सब कुछ सत्य-निष्ठा के बल पर उन्होंने संभव किया है।

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  • Web Title: कलम और कूची की धनी ममता