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दोषी अफसर को हो सकती है सजा

मतदाता सूची को बनाने, उसमें जरूरी संशोधन करने तथा नए मतदाताओं का नाम जोड़ने का प्रावधान आरपी एक्ट में किया गया है। इसके साथ ही इस कार्य के लिए चिन्हित पदाधिकारियों को अगर कर्तव्य में लापरवाही का दोषी पाया जाता है तो कम से कम तीन महीने और अधिक से अधिक दो वर्ष तथा जुर्माने की सजा का प्रावधान है। ‘हिन्दुस्तान’ की ओर से चलाए जा रहे अभियान के संदर्भ में विधिवेत्ताओं की ओर से जब पूछा गया तो न केवल सभी ने इस अभियान की सराहना की बल्कि कहा कि जो अधिकारी इस महत्वपूर्ण कार्य में लापरवाही बरत कर लाखों मतदाताओं को वोट के अधिकार से वंचित करते हैं उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में इस कार्य में लगे अधिकारी लापरवाही बरतने की हिम्मत नहीं कर सके।ड्ढr ड्ढr पटना हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता देवेन्द्र प्रसाद सिन्हा ने कहा कि 18 वर्ष की आयु पूरा करने के साथ ही इस उम्र के सभी व्यक्ित को मतदान का अधिकार मिल जाता है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि चुनाव के लिए मतदाता सूची बचाने के काम में लगे अधिकारी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते और लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं। श्री सिन्हा ने कहा कि आर.पी. एक्ट की धारा 21, 22 और 23 में नए मतदाता बनाने, मतदाता सूची में जरूरी संशोधन करने तथा मतदाता सूची को पुनरीक्षित करने का प्रावधान है। अगर इस कार्य के लिए जिम्मेवार किसी अधिकारी, कर्मचारी की लापरवाही के कारण पहचान-पत्र होने के बावजूद मतदाता सूची में नाम नहीं होने से मतदाता वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाता है, तो वैसे लापरवाह अधिकारी, कर्मचारी को दंडित करने का भी प्रावधान है। उन्होंने कहा कि आर.पी. एक्ट की धारा 32(1) में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया गया है कि बिना किसी वैध कारण के अगर कोई अधिकारी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है तो उसे कम-से-कम तीन महीने और और अधिकतम दो वर्ष की कैद तथा जुर्माना की सजा का प्रावधान है।ड्ढr ड्ढr अधिवक्ता माणिक वेदसेन ने कहा कि मतदाताओं को मत देने के अधिकार से वंचित करना एक गंभीर अपराध है और चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह मतदाता सूची को बनाने के काम में लगे विभिन्न स्तरों के अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही की जांच कर दोषी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाकर प्रशासनिक स्तर पर दंडित कर। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में मतदाताओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके मत से ही सरकार का गठन होता है। इसलिए चुनाव आयोग को इस मामले को काफी गंभीरता से लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। अधिवक्ता अजितेश्वर प्रसाद ‘जित्तू’ ने कहा कि पहचान-पत्र होने के बावजूद मतदाता सूची से नाम गायब रहना एक गंभीर अपराध है और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सरकारी कार्य का दायित्व नहीं निभाने के आरोप में विभागीय कार्रवाई चलाकर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

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