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इंजीनियरिंग की ऊंची उड़ान

आज के दौर में इंजीनियरिंग का क्षेत्र रोजगार की बेहतर संभावनाओं से भरपूर है। तरक्की और खुशहाली के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिहाज से यदि आप इस क्षेत्र में कदम बढ़ना चाहते हैं तो ऐसे विकल्पों की कोई कमी नहीं जो आकाशीय कामयाबी का सबब बन सकते हैं। खासकर तब जबकि देश में आई नई सरकार के ऊपर भी वादे के मुताबिक विकास और निर्माण योजनाओं को अमल में लाने का चौतरफा दबाव है। रपटों के मुताबिक भी अगले दो वर्षो के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में एक लाख से भी ज्यादा इंजीनियरों की जरूरत पड़ेगी। एयरोनॉटिक्स व एयरोस्पेस, कंप्यूटर साइंस, बायो इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, पैट्रो इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग, क्लीनिकल इंजीनियरिंग, नैनो टेक्नोलॉजी, पर्यावरण, ऊर्जा, समुद्र विज्ञान, मेटीरियल और मेटलर्जी जैसे क्षेत्रों में जाने की तैयारी की जा सकती है।

ये हैं उज्ज्वल संभावनाओं से भरे क्षेत्र

एयरोनॉटिक्स व एयरोस्पेस,
कंप्यूटर साइंस,
बायो इंजीनियरिंग,
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग,
पैट्रो इंजीनियरिंग,
एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग,
क्लीनिकल इंजीनियरिंग,
नैनो टेक्नोलॉजी,
पर्यावरण इंजीनियरिंग,
ऊर्जा,
समुद्र विज्ञान,
मेटीरियल और मेटलर्जी


ऐरो स्पेस इंजीनियरिंग

ऐरो स्पेस इंजीनियरिंग की शिक्षा कोई नई नहीं है। ऐरो स्पेस में शिक्षा का पहला प्रोग्राम आई.आई.टी. में 60वें दशक के मध्य में शुरू हुआ था।

हर वर्ष देश में 600 से 700 ऐरो स्पेस इंजीनियर तैयार होते हैं, जबकि मांग लगभग 5000 इंजीनियरों की है। ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस’ बंगलौर की ऐरो स्पेस इंजीनियरिंग के चेयरमैन बी. एन. रघुनंदन का कहना है कि इंडस्ट्री में मिलिट्री और सिविल का संयुक्त रूप से पुनर्विकास हुआ है।

कई कंपनियां जैसे टीसीएस, सत्यम, केड्स और इनफोसिस डिजाइन सर्विसेज के क्षेत्र में उतर रही हैं। अन्य कंपनियों ने भी ऐरो स्पेस में अनुसंधान कार्य करना शुरू कर दिया है। पहले यह कार्य सरकारी क्षेत्र की कंपनियां जैसे डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन आदि करती थीं। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे बोइंग, श्लमबर्जर और जीई ने अपने अनुसंधान केन्द्र स्थापित कर रखे हैं और एम.टेक/पीएचडी के प्रोफेशनल को नियुक्त कर विशेष अनुसंधान करवा रहे हैं।

इसमें रोजगार के अवसर तीन क्षेत्रों में हैं। ये क्षेत्र हैं :- डिजाइन, अनुसंधान और मेंटेनेंस। एक चौथा क्षेत्र भी है नीति निर्धारण और प्रशासन का। जहां ऐरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का संबंध एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर और संबंधित गतिविधियों से संबोधित है। वहीं ऐरो स्पेस इंजीनियरिंग का संबंध उपग्रह लांच वेहिकल, मिसाइल और स्पेस सिस्टम से है। विद्यार्थी डिजाइन, वैलिडेशन, मैन्युफैक्चरिंग एयरबोर्न स्ट्रक्चर्स के परीक्षण और संबंधित टेक्नोलॉजी का अध्ययन करते हैं। ऐरो स्पेस इंजीनियरिंग में रॉकेट और अंतरिक्ष यान से लेकर हेलीकॉप्टर्स तक के निर्माण, टेस्टिंग विश्लेषण आदि का अध्ययन किया जाता है। ऐरो स्पेस के कोर्स में फ्लूइड डयनिमिक्स, मैटेरियल्स साइंस, स्ट्रक्चरल एनालिसिस, प्रोपल्जन, ऑटोमेटिक की बुनियादी जानकारियां प्रदान की जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि विद्यार्थी बौद्धिक विकास और विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं तो हिंदुस्तान ऐरोनाटिक्स लि., इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन, जीआरडीओ नेशनल ऐरो स्पेस लैब्स आदि संगठनों में काफी अच्छी संभावनाएं हैं। इसमें आप विंड टनेल टेस्टिंग, गैस टर्बाइन इंजिन प्रोपल्जन, रॉकेट प्रोपल्जन, हाइब्रिड नेविगेशन, एबियोनिक्स और सेंसर्स, हॉट स्ट्रक्चर्स, फ्लाइट इस्ट्रमेंटेशन, एबियोनिक्स और सेंसर्स, हॉट स्ट्रक्चर्स, फ्लाइट इंस्ट्रमेंटेशन आदि का कार्य करना पड़ता है। इसका एक कमजोर पहलू यह है कि प्राइवेट सेक्टर की तरह से संगठन बहुत अच्छा वेतन नहीं देते। परंतु छठे वेतन आयोग के बाद अब अच्छे वेतन की आशा जागृत हुई है। वेतन तीन से साढ़े तीन लाख प्रतिवर्ष से शुरू होता है और 10 वर्षो के अंदर 10 से 13 लाख प्रतिवर्ष तक जा सकता है।

करियर विकल्प

एयर क्रॉफ्ट/एयर क्रॉफ्ट की डिजाइन, अनुसंधान और मेंटिनेंस का कार्य करना होता है। प्राइवेट कंपनियों या स्पेस या डिफेंस संगठनों में जॉब मिल सकता है।

कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग

इस क्षेत्र में बेस्ट टेलेंट्स के लिए मौके बड़ी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। गूगल, माइक्रोसाफ्ट, याहू हो या इन्फोसिस लगातार कंप्यूटर साइंस इजीनियरों की मांग निकालती हैं।

सॉफ्टवेयर कंपनियां भी इनकी तलाश में रहती हैं। बीटेक कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग प्रोग्राम में समय-समय पर डिवाइस ड्राइवर्स, नेटवर्क सिक्योरिटी, वायरलेस नेटवर्किंग, ई-कामर्स, सोशल नेटवर्किंग जैसे विषय भी आवश्यकतानुसार जोड़े जाते रहे हैं। अब तो एमटेक स्तर पर भी इसका विशेष कोर्स कराया जाता है। खासकर माइक्रोप्रोसेसरों की डिजाइनिंग का मामला हो या हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर में अपना हुनर दिखाने का। इस कोर्स की जरूरत पड़ती है। यह आपको 8 से 12 लाख रुपए सालाना का वेतन दिलाने का माध्यम बन सकता है।

कंप्यूटर साइंस में बीटेक और एमटेक करने वालों को भारतीय कंपनियों के अलावा विदेशी कंपनियों में भी ज्यादा वेतन और आकर्षक सेवाशर्तो पर जॉब के मौके मिलते हैं। कंप्यूटर साइंस में यदि आप पीएचडी करें तो यह सोने पर सुहागा होगा। सालाना 200 से 250 ऐसे प्रोफेशनल की मांग अब निकलती है जिन्हें कहीं ज्यादा बड़े सैलरी पैकेज पर नियुक्तियां भी मिलती हैं।

कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग का मार्ग सफलताओं और बेहतर उम्मीदों से भरा है। आइआइटी दिल्ली, मुंबई, खडगपुर, चेन्नई, रुड़की कानपुर के अलावा,  एनआइटी से भी इसके लिए शैक्षणिक योग्यता हासिल की जा सकती है।

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग

यह क्षेत्र इंजीनियरिंग के दूसरे करियर ऑप्शंस के मुकाबले सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण है। कम्युनिकेशन और इंस्ट्रूमेंटेशन इसकी परिधि में आते हैं। इसकी आज भी अच्छी-खासी मांग है। इसके कोर्स में बिजली के सर्किट से लेकर पावर सिस्टम, बिजली की मशीनें, ट्रांसफारमर, ऑटोमेटिक कंट्रोल सिस्टम, कंप्यूटराइज्ड उपकरणों संबंधी गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए अधिकांश आइआइटी में 5 वर्ष की दोहरी डिग्री (बीटेक व एमटेक) के पाठ्यक्रम भी उपलब्ध कराए जाते हैं। दिल्ली आइआइटी में इसका कोर्स 5 साल है। इसमें सफल प्रत्याशियों को नौकरी पाने में कोई दिक्कत नहीं होती क्योंकि मांग निकलती रहती है। वेतन 2.5 लाख से 15 लाख सालाना तक होता है।


इंस्टीट्यूट्स

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलौर
www.iisc.emd.in

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, देहरादून
www.iiaedehradum.org

आई.आई.टी. (खडम्गपुर, कानपुर, मुम्बई, मद्रास)
www.iit (kgp/k/b/m) ac.in

एकेडमी ऑफ ऐरो स्पेस एंड एबिएशन, इंदौर
www.aaaindore.com

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, खडम्गपुर
www.iitkgp.ac.in

तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी
www.tmau.ac.in

इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च यूनिवर्सिटी, दिल्ली

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लूर
www.cmch-vellore.edu

दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
www.dcu.edu

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कालीकट
www.nitc.ac.in

अलीगढम् मुस्लिम यूनिवर्सिटी
www.amu.ac.in

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दुर्गापुर, राउरकेला, वारांगल, भोपाल, जालंधर
www.nit.ac.in

सेंटर फॉर एनर्जी स्टडीज, आइआइटी, दिल्ली
www.iid.ac.in

पांडिचेरी इंजीनियरिंग कॉलेज
www.pec.edu

एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग

इंजीनियरिंग के किसी भी क्षेत्र की छवि एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग जैसी नहीं है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि में जो तकनीकी प्रगति हुई है उसका श्रेय एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग को ही दिया जाना चाहिए। कृषि के लिए मशीनों का विकास, जल वितरण की योजना-नहरें, जलाशय, बांध और फसलों के उत्पादन व सिंचाई के लिए इनका प्रयोग, मिट्टी का प्रयोग, संरक्षण की तकनीक, एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग, फूड प्रोसेसिंग एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग से कृषि कार्य में तो आसानी होती ही है, फसल कटाई के समय भी एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग ट्रांसपोर्टेशन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग में काफी सहायता पहुंचाते हैं। इस सेक्टर में जो प्रगति हो रही है, इसमें चार महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं-फार्म मेकेनाइजेशन, नेचुरल रिसोर्स कंजर्वेशन टेक्नॉलोजी, पोस्ट हार्वेस्ट प्रॉसेसिंग और वैल्यू एडीशन और बॉयो एनर्जी जेनरेशन। इनमें जॉब के खूब मौके हैं।

भारत में एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की शुरुआत 1942 में इलाहाबाद एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट से हुई थी। अब यह यूनिवर्सिटी इलाहाबाद एग्रीकल्चरल डीम्ड यूनिवर्सिटी के नाम से जानी जाती है। एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री एक फाउंडेशन कोर्स है। इसमें मानवता और समाज विज्ञान, बेसिक और एप्लायड साइंसेज, इंजीनियरिंग साइंसेज, इंजीनियरिंग डिजाइन और कंस्ट्रक्शन से संबंधित पढ़ाई होती है। मास्टर लेवल की पढ़ाई में कोई विशेष विषय जैसे वाटर इरिगेशन या फॉर्म मशीनरी ले सकते हैं। एग्रीकल्चरल इंजीनियर्स को अधिकतर जॉब ट्रैक्टर कंपनियों, फार्म टूल्स एंड मशीनरी मैन्युफैक्चर्स, लैंड डेवलपमेंट, इरिगेशन एंड ड्रेनेज इक्विमेंट मैन्युफैक्चर्स, फूड एंड डेयरी इंडस्ट्रीज में मिलता है। वेतन प्रतिमाह 20 से 30 हजार रुपए है।


पर्यावरण इंजीनियरिंग

प्रदूषण नियंत्रण के लिहाज से किसी भी बड़े निर्माण कार्य, औद्योगिक इकाई, होटल, एयरपोर्ट या बांध बनाने से पहले ही इन इंजीनियरों काम यह पता लगाना होता है कि पर्यावरण पर इन निर्माण कार्यो का कैसा असर होगा और यदि प्रतिकूल असर होगा तो उस कार्ययोजना में इसके लिए क्या जरूरी उपाय किए जाने चाहिए। यह उपाय और बदलाव के सुझाव देना और लागू कराना भी इन्हीं की जिम्मेदारी है। इस क्षेत्र में ऐसे पेशेवरों की जरूरत है जो पर्यावरण की सुरक्षा के महाअभियान में सार्थक भूमिका निभा सकें। प्रदूषण की गंभीर समस्या से उत्पन्न खतरों का मुकाबला करने की दृष्टि से भी इनकी जरूरत है।

इसके कोर्स में सिविल और कैमिकल इंजीनियरिंग का तालमेल होता है। आइआइटी जेईई के जरिए इसमें चयन होता है। यह 4 साल का एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग (बीई) का बैचलर कोर्स एक इंटर डिसिप्लिनरी प्रोग्राम है जिसमें एयर क्वालिटी कंट्रोल, वाटर सप्लाई, वेस्ट वाटर डिस्पोजल, स्टार्म वाटर मैनेजमेंट, सालिड वेस्ट मैनेजमेंट शामिल हैं। आइआइटी कानपुर और खड़गपुर ने अपने कोर्स में इस क्षेत्र के प्रबंधकीय पहलुओं को भी शामिल किया है। पर्यावरण से जुड़े इंजीनियरों को आजकल 5-7 लाख रुपए का सालाना पैकेज आसानी से मिल जाता है।

क्लीनिकल इंजीनियरिंग

अस्पतालों में नई तकनीक, मेडिकल उपकरण उद्योग और मेडिकल टूरिज्म के बढ़ते कदमों की बदौलत रोजगार के नए अवसरों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। देशभर में करीब 20 हजार अस्पतालों में ट्रेंड क्लीनिकल इंजीनियरों की रिक्तियां निकलती रहती हैं। इसमें मेडिसन के साथ जीव विज्ञान, क्लीनिकल प्रक्टिसेज, उपकरण विकास और प्रबंधन पहलुओं का प्रशिक्षण दिया जाता है। करीब 7 से 12 लाख वार्षिक वेतनमान वाले इस जॉब के लिए आइआइटी मद्रास, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लूर के अलावा भी कई संस्थान बीटेक और एमटेक कोर्स कराते हैं। यह कोर्स सामान्यत: 2-3 वर्ष का है।

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  • Web Title: High flying engineering