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बिना खून लिए मलेरिया की जांच

काश, मलेरिया पुष्टि के लिए खून की जांच भी हो जाए और खून भी न निकालना पड़े - यानी सुई की चुभन और इससे होने वाले भय से मुक्ति। ऐसा लगता है कि इस सपने को हकीकत बनने में अब ज्यादा देर नहीं है। ब्रिटेन के एक्सेटर विश्वविद्यालय के डॉ. डेव. न्यूमेन के नेतृत्व में बड़ी तेजी से एक ऐसा डिटेक्टर बनाने पर काम चल रहा है, जिसमें चुंबक का उपयोग किया जएगा। इसे मोट-टेस्ट के नाम से भी जाना जाता है।

डॉ. डेव को यह डिटेक्टर बनाने का ख्याल करीब एक साल पहले अपने एक जीव विज्ञानी मित्र से बातचीत के दौरान आया था। मलेरिया आज भी हर साल दुनिया भर में 50 करोड़ से अधिक लोगों को अपनी चपेट में लेता है और दस लाख से अधिक लोग मृत्यु के शिकार हो जते हैं। मरने वालों में बच्चों की संख्या सबसे अधिक होती है।

दरअसल, अभी तक मलेरिया के परजीवी की रक्त में उपस्थिति का पता लगाने का एक ही तरीका रहा है - सुई की मदद से रक्त के नमूने लेना और प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी की मदद से उनकी जंच करना। इसमें समय तो लगता है ही, साथ ही काफी दक्षता की भी जरूरत होती है।

पिछले सालों में कुछेक एंटीबाडी आधारित जंच के तरीके आए हैं जिनके सहारे फील्ड में ही रक्त की जंच संभव है। एंटीबडी वह पदार्थ होते हैं जिन्हें शरीर किसी बाहरी चीज के विरुद्ध बनाता है। लेकिन एक तो हर तरह के मलेरिया के लिए अभी ऐसे टेस्ट उपलब्ध नहीं हैं और दूसरे इनमें बी मरीज का खून तो निकालना ही पड़ता है। जंच का यह तरीका काफी मंहगा भी बैठता है।

डॉ. डेव चुंबक और प्रकाश आधारित अपनी तकनीक की एक पोर्टेबल डिजइन पर काम कर रहे हैं जो बैटरी से चले। इसे त्वचा के पास रखकर एक बटन दबाने से यह पता चल जएगा कि रक्त में मलेरिया परजीवी है या नहीं और उसकी मात्रा कितनी है। मीटर की तरह इस री¨डग को पढ़ा ज सकेगा। इसके लिए ज्यादा दक्षता भी नहीं चाहिए। 

अब मिनटों में चलेगा बीमारी का पता 

याद कीजिए जब पिछली बार आपको तबियत खराब महसूस हो रही थी और बेहतर डायग्नोसिस के अभाव में डॉक्टर आपका वायरल फीवर का इलाज कर रहा था। अंत में प्रयोगशाला में टेस्ट के द्वारा जनकारी हुई कि आपको डेंगू या टायफायड था। शुरुआत में ही वायरस की पहचान करने के लिए डॉक्टरों में प्वांइट केयर डिवाइस इस्तेमाल करने का प्रचलन बढ़ा है।

आíटमिस हैल्थ इंस्टीटच्यूट, गुडगांव के इंटरनल मेडिसिन के हेड आशुतोष शुक्ला कहते हैं कि शुरुआत में प्रत्येक स्तर पर बीमारी के लक्षण समान होते हैं। उदाहरण के तौर पर लो ग्रेड फीवर और सामान्य बीमारी के शुरुआती लक्षण पीलिया जसे होते हैं, लेकिन जब तक शरीर में पीलापन न दिखने लगे, इसे पहचान पाना मुश्किल होता है। प्वांइट ऑफ केयर डिवाइस इस मामले में ही फायदेमंद है कि इससे फिजीशियन को शुरुआत में ही पता चल जता है कि बीमारी क्या है।

यही वजह है कि प्वाइंट ऑफ केयर डिवाइस प्रसिद्धि पा रही है। बैंगलुरू बेस्ड बायोटेक्नोलॉजी  कंपनी जल्द ही डीएनए रिकोगनिशन तकनीक का इस्तेमाल कर हेपिटाइटिस-बी का पहचान करने वाली डिवाइस को लांच करने ज रही है। लांच की जने वाली यह किट वायरस की पहचान कर लेगी और पंद्रह से बीस मिनट में टेस्ट की जनकारी देगी। बिग टेक के को-फाउंडर चंद्रशेखर नैयर कहते हैं कि  शुरुआत में इस किट का इस्तेमाल खून के सैंपल में किया जता है। मेडिकल डाइरेक्टर बी.के. अय्यर का कहना है कि चिकनगुनिया, मलेरिया और डेंगू जसे बीमारियों के लिए ऐसी किट का विकास किया जा रहा है।

इस महीने के मलेशिया बेस्ड जीनफ्लाक्स बायोसाइंस प्राइवेट लिमिटेड माइडेंटकिट लांच करने ज रही है, जो कि मॉलीकुलर डायग्नोस्टिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर डेंगू वायरस की 5 घंटे में पहचान करेगी। इसके अलावा कंपनी मुर्साफ्लक्स किट को लांच करने की योजना बना रही है, जो  खून में एमआरएसए (मेथीकिलिन रजिस्टेंट स्टेफाइलोकोकस औरीअस) की पहचान करेगी। ये किट तीन तरह के बैक्टीरिया की पहचान करेगी।

जीनफ्लक्स बायोसाइंस के डाइरेक्टर और वाइसप्रेसीडेंट पारसनाथ. जी. बागली का कहना है कि एमआएसए इंफेक्शन की वजह से निमोनिया, हड्डियों और जोड़ों में दर्द, इंडोकार्डेटिस जसी बीमारियां हो सकती हैं। मेडिकल प्रोफेशनल का कहना है कि इन किट को लैब इन चिप के  रूप में इस्तेमाल किया ज सकता है।

इससे डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट तकनीक को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। डॉ. शुक्ला का कहना है कि यह डिवाइस बीमारियों के चरम पर पहुंचने से पहले ही उसकी पहचान कर लेगी। हालांकि अभी इसके बारे में डॉक्टर थोड़ा संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। मानव का शरीर एक अंकगणितीय मॉडल नहीं है। इसके परिणामों का प्रयोग कभी-कभार पारिवारिक इतिहास और क्लीनिकल परीक्षण के लिए कर सकते हैं।

संक्रमित बीमारियों के निदान के अलावा प्वाइंट ऑफ केयर डिवाइस के कई और फायदे हैं। उदाहरण के तौर पर वाइस्कोप 100 जो काíडयक फिजीशियन और स्पेशलिस्ट को हृदय की गतिविधियों के बारे में बताता है, की सहायता से डॉक्टर सलाह के दौरान मरीज के दिल की गतिविधि को देख सकता है। मनिपाल हैल्थ सिस्टम के पैडायट्रिक काíडक सíवस के डाइरेक्टर और सलाहकार श्रीकांत राघवन कहते हैं कि यह डिवाइस ऑडियो-वीडियो फॉर्मेट में पूरक जनकारी प्रदान करती है।

ग्लूकोमीटर की सहायता से रोगी प्वाइंट ऑफ केयर डिवाइस की सहायता से अपना ग्लूकोज का स्तर जंच सकती है। मधु नेहा डायबिटिक सेंटर, बेंगलुरू की कंसलटेंट डायबिटोलॉजिस्ट सुमन. आर का कहना है कि ग्लूकोमीटर से घर में जंच करने में 15 से 20 प्रतिशत तक बदलाव संभव है। इस वर्ष के अंत में जीनफ्लक्स बायोसाइंस तीसरी डायग्नोस्टिक किट हेमफ्लाक्स लांच करेगा, जो टाइप 2 डायबिटीज की जांच करेगा।

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