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जींस पर प्रतिबंध के खिलाफ हैं छात्राएं

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में चार महाविद्यालयों द्वारा परिसरों में छात्राओं के जींस पहनने पर प्रतिबंध लगाए जाने के फैसले को लेकर छात्राओं में ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी रोष है।

इनका कहना है कि छेड़खानी की घटनाओं को जींस पर प्रतिबंध लगाने से रोका नहीं जा सकता है। इससे अच्छा होता कि महाविद्यालय छात्राओं को मार्शल आर्ट का प्रशक्षिण देकर मनचलों से मुकाबला करने के लिए उन्हें सक्षम बनाते।

सामाजिक कार्यकर्ता नीलम चतुर्वेदी ने महाविद्यालयों के निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि इस फैसले से ऐसा लगता है कि मानो जींस पहनने वाली लड़कियां ही छेड़खानी का शिकार होती हैं।

उन्होंने कहा कि मैं सैकड़ों ऐसे मामले गिना सकती हूं जहां सलवार-कुर्ता पहनने वाली लड़कियों के साथ छेड़खानी हुई है। बेहतर होता कि कि छात्राओं को मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण दिया जाता, ताकि वे मनचलों को सबक सिखा सकतीं।

महिला कार्यकर्ता रुपरेखा वर्मा कहती हैं कि एक ओर हम समाज में लड़के और लड़कियों को बराबरी का हक देने की बात करते हैं और दूसरी ओर उन पर इस तरह के फैसले थोपते हैं। इससे समाज में लड़कियों के कमजोर होने का संदेश जाएगा।

महाविद्यालयों के फैसले की आलोचना करते हुए दयानंद महिला महाविद्यालय की छात्रा तुलिका सक्सेना कहती हैं कि जींस पहनने में कोई अश्लीलता नहीं है। जींस ऐसा परिधान है जो सिर्फ फैशन के ही लिए नहीं पहना जाता, बल्कि यह दैनिक उपयोग में सलवार की अपेक्षा ज्यादा आरामदायक होता है।

दयानंद कॉलेज की छात्रा निशा बाजवा कहती हैं कि जींस पहनने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला पूरी तरह गलत है। कॉलेज प्रशासन को छेड़खानी रोकने के लिए पुलिस की मदद लेनी चाहिए। बाजवा के सुर में सुर मिलाते हुए सेन कॉलेज की विनीता शर्मा कहती हैं मिनी स्कर्ट और शॉर्ट टॉप पर राेक लगाने की बात तो समझ में आती है, लेकिन जींस पर रोक लगाना समझ से परे की बात है।

ज्ञात हो कि गत 9 जून को कानपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध शहर के दयानंद महिला महाविद्यालय, सेन बालिका महाविद्यालय, जौहरी महिला महाविद्यालय और आचार्य नरेंद्र देव महिला महाविद्यालय ने बढ़ती छेड़खानी की घटनाओं पर रोक लगाने के नाम पर एक संयुक्त बैठक के बाद छात्राओं के महाविद्यालय परिसर में जींस पहनने पर रोक लगाने का फैसला किया था।

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