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असुरक्षित घर

बच्चों के लिए दुनिया में सबसे सुरक्षित इलाका उनका अपना घर होता है। घर में वे मां की गोद और पिता के साए तले अपने सब दु:ख-दर्द भूल जाते हैं। लेकिन वही घर जब उन्हें बजाय सुरक्षा देने के जीवन भर रिसने वाला जख्म दे दे, तो वे किसके पास जाकर अपने घावों पर मरहम लगाएं? हाल ही में मुंबई और पंजाब में पिता द्वारा बेटी से बलात्कार की घटनाओं ने बच्चों के मन में एक अनजाना भय पैदा कर दिया है। एसा नहीं है कि एसा पहली बार हुआ है। पहले भी परिवारों में छिपे तौर पर इस तरह के मामले होते थे, लेकिन परिवार की ‘इज्जत’ के नाम पर उन्हें दबा दिया जाता था। आज भी मां की मौन सहमति या विरोध न कर पाने की स्थिति में ज्यादातर मामले उाागर नहीं होते, लेकिन लड़कियां अब इस तरह की घटनाओं का विरोध करना सीख गई हैं। दिल्ली में सन् 2000-2005 के बीच हुए बलात्कार में अजनबियों का कम और अपनों का हाथ ज्यादा रहा। अपनों में भी सबसे करीबी पिता ने बाप-बेटी के रिश्ते को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसा नहीं है कि यौन-शोषण केवल लड़कियों का ही हो रहा है। लड़कों का शोषण भी समान रूप से हो रहा है। बाल शोषण पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट में इस चौंकाने वाले तथ्य को उाागर किया गया है कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और यौन-शोषण ज्यादा हो रहा है। भाारत में सर्वाधिक शोषण के शिकार बच्चे 5 से12 साल तक की कच्ची आयु के हैं। अत: भयावह स्थितियों को झेलने वाले 70 प्रतिशत बच्चे अपनी दर्द भरी दास्तान किसी को नहीं बताते। जब तक बात समझ में आती है, तब तक पानी सिर से गुजर चुका होता है। बचपन में शोषण के शिकार बच्चे उम्र भर मन में कुंठा लिए जीते हैं, जिसका उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है। रोंगटे खड़े करने वाले इन घिनौने कृत्यों को रोकने के लिए बच्चों की परवरिश तो इस ढंग से की ही जानी चाहिए कि वे अच्छे-बुर में फर्क समझ सकें, पर घरों तथा स्कूलों की व्यवस्था भी एसी बननी चाहिए कि बच्चे खुल कर विरोध करना सीखें और अपने को लेकर ग्लानि न पालें। साथ ही एसे बलात्कारी के लिए तुरंत और कठोर दंड का प्रावधान भी लागू होना जरूरी है।

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