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24 फरवरी, 2020|11:13|IST

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पैर परिधान योजना

हमें हैरत होती है ‘राम चरित मानस’ पढ़ कर। भरत नामक राम के छोटे भाई ने, बड़े भ्राता के वन-गमन के बावजूद, उनका सिंहासन नहीं हथियाया। उल्टे रामजी के खड़ाऊं को सिंहासन-नशीं करके चौदह साल तक उनकी वापसी की प्रतीक्षा की। कैसे अजीब और सिड़ी किस्म के इंसान रहे होंगे, उस युग में!

समझदारी का जमाना तो आज है। चंद सिक्कों के लिए छोटा, सिर्फ बड़े भाई को ही क्यों, अपने बाप तक को न बख्शे। चरणपादुका, खड़ाऊं या पैरों के परिधान का सहस्त्रों वर्ष पूर्व उपलब्ध होना हमारी शानदार समृद्धि का प्रतीक है। आज हजरों साल बाद यह आलम है कि गांवों में ही नहीं हमारे शहर तक में तपती जमीन पर बच्चे नंगे पांव नजर आते हैं। यों हमने तरक्की तो काफी की है। बस पेट और पैर कुछ छूटे हुए हैं।

हमें यकीन है। अगर प्रजतंत्र प्रगति करता रहा तो पेट भरने की ‘नरेगा’ स्कीम के समान, कोई ‘पैपयो’ (पैर परिधान योजना) भी जरूर बनेगी। हमें कभी-कभी ताज्जुब होता है। राम जी के पास कितने खड़ाऊं रहे होंगे। एक जोड़ी तो भरत ने हथिया ली, सिंहासन पर आसीन करने को। राम जी ऐसे-वसे तो थे नहीं। दशरथ के बनवास के हुक्मनामे से क्या होता है? राम राज थे। नंगे पैर तो जंगल में आते नहीं।

ऐसे भी लक्ष्मण-सीता के साथ एक दो नहीं, पूरे एक दशक ऊपर चार वर्ष जंग में एक जोड़ी खड़ाऊ के साथ बिताना मुमकिन है क्या? तीन-तीन जोड़ी खड़ाऊं की दरकार रही होगी, राम, सीता, लक्षमण को एक-एक बार में। क्या वक्त था तब। जंगल तक में खड़ाऊं जसा पांव-प्रसाधन प्रचुरता से उपलब्ध रहा होगा, वरना राम जी की टीम का वन-गमन के दौरान गुजरा कैसे होता? कंद, मूल, फल वगैरह की भी बहुतायत होगी।

अपन वर्तमान से तुलना करते हैं और उदास हो जते हें। जंगल के पेड़ों की नियति कटने की है और गांवों की अभाव की। जूता, चप्पल, चमरौंधा, सब्जी, तेल, दवा-दारू जसे अनिवार्य साधन तक नहीं हैं तो क्रीम, पाउडर, साबुन, मंजन जसे विलासिता के सामान का कौन कहे।

राम जी के समय तो था ही, आज भी खड़ाऊं का बड़ा महत्व है। तब खड़ाऊं ने अयोध्या के सिंहासन की शोभा बढ़ाई थी। आज भी मुल्क के लोकतंत्र काल में स्वयं को बड़के की खड़ाऊं बता कर छुटके नेता चुनाव की वतरणी पार कर ही जते हैं। इसका एक और निहितार्थ है। यह मुगालता है कि जनता की याददाश्त कमजोर है। वह राम ही क्यों, उनकी खड़ाऊं को भी आज तक नहीं भूली है, न नेकदिल नेताओं के योगदान को। नहीं तो, परिवार के वारिस, पुरखों की धरोहर के बूते, कैसे सत्ता पाते रहते।

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