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बुरा मानो या भला : प्राथमिकताओं पर गौर करें

अपने देश की गरीबी से कैसे निपटा जए? हम सब इस बारे में कोई न कोई राय रखते हैं। मेरी भी अपनी राय है। मैंने इस सिलसिले में अपनी प्राथमिकताएं तय की हुई हैं। उसे मैं देश के दो अलग तरह के लोगों के सामने पेश करना चाहता हूं। अगर उन्हें गंभीरता से लिया जाए, तो आने वाले वक्त में हिंदुस्तान का चेहरा बदल जएगा। एक तरह के लोग तो राहुल गांधी और उनकी युवाओं की टीम है। उनमें से ज्यादातर अब सांसद हैं।

 दूसरी तरह के लोग धर्मगुरु हैं। उनमें साईं बाबा, जगदगुरु, बापू, संत, साधु-साध्वी और प्रचारक हैं। मुङो लगता है कि आम आदमी तक उनकी पहुंच नेताओं से कहीं ज्यादा है। अगर वे समाज सुधार के लिए तैयार हो जएं, तो यह एक आंदोलन की शक्ल ले सकता है।

मेरी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर आबादी को रोकना है। सरकारी नारेबाजी का कोई असर नहीं हुआ है। अब उस सिलसिले में अलग ढंग से कुछ करने की जरूरत है। बेहतर तो यह होता कि हम दूसरे बच्चे के बाद नसबंदी को जरूरी कर देते। यह बेहद कठोर लग सकता है। अगर नहीं तो हमें कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि दो से ज्यादा बच्चे करने वालों को कोई भी सरकारी जगह न मिले। वे गांव पंचायत, विधानसभा और संसद के लिए न चुने ज सकें। 

मेरी दूसरी प्राथमिकता ज्यादा बिजली बनाना है। लेकिन वह कोयले और तेल के अलावा बननी चाहिए। सबसे अच्छी तो एटमी ऊज्र है। मुङो उम्मीद है कि अमेरिका और हिंदुस्तान के बीच हुई एटमी डील से जल्द ही बेहतर नतीजे आने लगेंगे। तीसरी प्राथमिकता पर्यावरण और जंगल की जिंदगी को बचाना है। हमें पेड़ काटने पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। अगर कोई विकास का जरूरी काम न हो, तो उस पर सख्ती से अमल होना चाहिए। मसलन, सड़क, नहर या रेल की लाइनें बिछाने जसा काम।

हमें अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। उसकी जगह विद्युत शवदाह गृह का इस्तेमाल कर सकते हैं। अभी ऐसी जगह बहुत कम हैं। हमें गांव-गांव, शहर-शहर में उन्हें बनाना चाहिए। या सरकार को हिंदू, सिख, जन और बौद्धों को दफनाने के लिए जगह देनी चाहिए। इस शर्त के साथ कि उन पर कोई स्मारक नहीं बनेगा। पांच साल के बाद वह जमीन खेती-बाड़ी के काम आ सकेगी।

धर्मगुरु इस सिलसिले में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे लोगों को समझ सकते हैं कि शवों को लकड़ी से जलाना कोई धार्मिक जरूरत नहीं है। वे अपने लोगों को नदी में प्रतिमा विसजिर्त करने को मना कर सकते हैं। उन प्रतिमाओं की वजह से नदी में प्रदूषण फैलता है। समुद्री इलाकों में समुद्र में ही अंतिम संस्कार होना चाहिए।
 अगर हम अपने जंगल बचा पाए, तो हम वहां की जिंदगी को बचा पाएंगे। मेरे सुझवों पर सोच-विचार करें। अगर अच्छे न लगें, तो एक बूढ़े आदमी की फंतासी मान कर नकार दें।

रौला रप्पा

हाल ही में वियना में सिख गुटों में मार पिटाई हुई। बाद में उसका खामियाज पंजब को भी भुगतना पड़ा। मुङो एक पंजबी कहावत याद आई-एक सिख, एक सिख। दो सिख, सिंह सभा। तीन सिख, रौला रप्पा। मैं जब पहली बार वियना गया था, तो मैंने वहां एक भी सिख नहीं देखा था। मैंने तब एक सप्ताह वहां बिताया था। कुछ साल बाद दूसरी बार जब मैं वहां गया, तो मुङो बताया गया था कि कई  सिखों को ऑस्ट्रियाई सरकार ने पनाह दी है।

उन्होंने सरकार से कहा था कि वे संत भिंडरावाले के अनुयायी हैं। अगर वे हिंदुस्तान में रुकते, तो उन्हें पुलिस मार डालती। उन्होंने वहां एक सिंह सभा और गुरुद्वारा बना दिया। वे जट सिख थे। बाद में वहां गैर जट सिख आए। वे दलित थे। उन्हें जटों के बनाए गुरुद्वारे में दिक्कत होती थी, सो उन्होंने उसी सड़क पर अपना गुरुद्वारा बना डाला। जहिर है रौला रप्पा शुरू हो गया।

कुछ दिन पहले जब एक पंथ के संत कहीं चले गए, तो दूसरे पंथ के लोगों ने उनके गुरुद्वारे पर हमला बोल दिया। उनके मुखिया को मार डाला। उसकी प्रतिक्रिया में जलंधर, अमृतसर, लुधियाना, पटियाला वगैरह में तबाही मची। ट्रेन जलाई गईं। बसें फूंकी गईं। प्रधानमंत्री ने शांति की अपील की। उन्हें बताया कि सिख गुरु जतिवाद के खिलाफ थे। लोगों ने उनकी अपील नहीं सुनी।

ऐसा नहीं है कि सिखों में जति को लेकर कोई लफड़ा नहीं है। शायद ही वहां जति के बाहर शादी होती हो। इसी वजह से वहां सैकड़ों डेरे बने। बाबाओं और संतों की बन आई। वे गुरु ग्रंथ साहिब को मानते हैं लेकिन जोर संतों-बाबाओं पर ही रहता है। यही दिक्कत है।

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