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संत सांवता माली

संत सांवता माली की, विट्ठल के प्रति अनन्य भक्ति थी। माली का काम करते थे और विट्ठल को माला भेजा करते थे। वह माला भक्त-हृदय की साक्षात पुष्प-अभिव्यक्ति होती थी। फूलों को जितनी रुचि से वह चुनते थे, उतनी ही तन्मयता से उन्हें धागे में पिरोते थे।

सांवता माली पंढरपुर से दस-बारह मील दूर, अरणभेंडी नामक स्थान में रहते थे। इनके पिता का नाम परसुवा और माता का नांगिता बाई था। ज्ञानेश्वर की संत मंडली में सांवता माली को बड़ा सम्मान प्राप्त था। एक बार ज्ञानेश्वर, नामदेव और विट्ठल संत कूर्मदास से मिलने ज रहे थे। रास्ते में अरणभेंडी स्थान पड़ा। विट्ठल ने ज्ञानेश्वर और नामदेव से कहा- ‘आप लोग, कुछ देर यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। मैं अभी सांवता से मिलकर आता हूं।’

इतना कह कर विट्ठल सांवता के पास आकर बोले- ‘तुम मुङो कहीं छिपा लो दो चोर मेरे पीछे पड़े हैं।’ सांवता ने विट्ठल को अपने हृदय में छिपा कर ऊपर से चादर ओढ़ ली और बैठ गए। इधर जब काफी देर तक विट्ठल नहीं लौटे तो ज्ञानेश्वर और नामदेव सांवता के पास आए। देखा तो सांवता ‘विट्ठल..विट्ठल’ का नाम स्मरण कर रहे थे।

ज्ञानेश्वर और नामदेव ने उनसे प्रार्थना की- ‘अरे भाई! भगवान के दर्शन करा दो। उन्हें कहां छिपा रखा है?’ तब सांवता ने विट्ठल को बाहर निकाला। सभी लोग भगवान विट्ठल के दर्शन करके गद्गद हो गए। महाराष्ट्र के संतों में, सांवता माली की, विट्ठल के प्रति भक्ति को देखकर, सर्वत्र उनका सम्मान होता था और उनकी विचारधारा तथा अभंग आदि लोकप्रिय हो गए थे।

उनकी स्मरण में अनूठी आस्था थी। वह सर्वत्र, सभी पदार्थो में एक ही भगवान को देखा करते थे। उन्होंने अपने एक अभंग में कहा है- ‘नाम का ऐसा बल है कि अब मैं किसी से भी नहीं डरता। मैं तो कलिकाल के सिर पर डंडे जमाया करता हूं। विट्ठल नाम गाकर और नाचकर हम लोग उन वकुण्ठपति को यहां अपने कीर्तन में बुला लिया करते हैं। इसी भजनानन्द की दिवाली मनाते हैं और चित्त में उन वनमाली को पकड़कर पूज किया करते हैं। सांवता कहता हैं कि भक्ित के इस मार्ग पर चले चलो। चारों मुक्ितयां अपने आप तुम्हारे द्वार पर आकर गिरेंगी।’

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